सोमवार, 29 दिसंबर 2008

विमुखता

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं जंगल में जाकर दूर तक
तोड़ लाता मेहंदी के झाड़।
उनकी हथेलियों का चटख रंग
बिखरता पूरे दिन मेरे होठों पर
मुस्कराहट बनकर।

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं समंदर में उतरकर गहरे
इकठ्ठा कर लाता मोतियों वाले सीप।
उनके गले की श्वेत आभा
झिलमिलाती पूरे दिन मेरी आंखों में
चमक बनकर।

बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं भोर में बगीचे से
चुन लाता बेला के फूलों को ।
उनके बालों की मादक सुगंध
बसती पूरे दिन मेरी साँसों में
गुदगुदी बनकर।

उन्होंने मांग लिया विमुखता मुझसे
और मैंने पहना दिए
अपनी चाह को श्वेत परिधान।
उसकी डबडबायी आँखें
चुभती हैं पूरे दिन मेरे सीने में
फाँस बनकर।

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