शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

प्रस्फुटित नव कोपलों के
मुस्कराते अधर पट पर
व्यथा-संचित,दाह -पूरित,
मौन का भीषण गरल धर
हर्ष गुंजित क्यारियां
नीरव सदा को छोड़ आया

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

उतरते मन व्योम पर शशि,
चन्द्रिका को बाहु भर कर
नृत्य को उद्यत हुआ ज्यों
प्रणय का नव राग भर कर
व्योम,शशि औ चन्द्रिका को
राहु बन कर लील आया

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

नव- यौवना सी चाह के
मासूम स्वर्णिम स्वप्न पर
ले जलन बड़वानल सदृश
विच्छोह बरसा,अनल बन
गुरु- वेदना अभिसिक्त , कातर,
सजल लोचन छोड़ आया

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

चल रहा अभिशाप मेरा
संग, प्रतिपल काल बन
स्पर्श मेरा, दंश विषधर -
सा दिया पीड़ा सघन
जिस प्राण प्रिय से प्रेम को
पोषित उमंगो से किया
नवजात शिशु के कंठ को ही
निज करों से घोट आया

हा ! तुम्हे कितना रुलाया

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