मंगलवार, 20 जनवरी 2009

पुकार

नाविक !
तुम अभी तक कर रहे विश्राम ?
उठो ! चलो ! पकड़ो पतवार !
जल्दी बाँधो पाल ,
हमको जाना है उस पार।

पूर्व क्षितिज में कितना ऊपर
चढ़ आया है सूर्य,
गवां दिए कितने ही पल निद्रा में
हमको जाना कितनी दूर।

आह ! तुम्हारी कितनी जर्जर नाव !
और लहरों का वेग प्रचंड,
उठ रहे पल पल भीषण ज्वार
भर रहे हैं मन में आतंक.

हाय! भरी कितने छिद्रों से
तेरी टूटी नाव ,
और
किनारा भी दिखता अति दूर।
चल रहीं कितनी प्रबल हवाएं ,
नाव डुबाने को आतुर।

भाग रहा द्रुत गति से दिनकर ,
पूर्ण करने को अपनी राह।
बची शेष हैं कुछ घडियां ,
भर रहा सघन मन में अवसाद।

लगता यह दिन भी होगा बेकार ,
न कर पायेंगे हम पार,
अभी तम छाएगा चहुँ ओर
फंसा देगी हमको मँझधार.

आह!
लगा दी कितनी देर
समय से किया नही प्रस्थान .
अभी तो राह हुई है मध्य
क्षीण होता प्रतिपल दिनमान।
बढ़ रहा तिमिर इस ओर,
पसारे अपनी बाँह,
झांक रहा है
क्षितिज ओट से
मुस्काता अवसान ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अनुभूति है

    ---आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

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  2. Poems compiled under the headline “Pukar” are very thoughtful and sensitive. Shows the mature feeling of poet and ability to put it in words very effectively. Good consistency and flow maintained till the end. Reminds of Gitanjali by Ravinder nath Tagore. Good effort. Wish you all the best Pratap.

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  3. अन्नपूर्णा जी ! आपको कविता इतनी पसंद आयी कि गीतान्जली कि याद आ गयी, इस उदार सराहना के लिए बहुत बहुत आभार.
    सच तो यह है कि मेरी कोई भी रचना यदि गीतान्जली का चरण रज भी स्पर्श कर सके तो मेरा अहोभाग्य होगा. गीतान्जली जैसी रचनाएं युगों में एक ही होती हैं .

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  4. prtap ji dhnywad,aapki kavita padhi pasand aai "aah laga dee kitani der samay se kiya nahi prasthan ,bahut sundar
    seema

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  5. ah udhar prachnd lahron ka veg------bahut hi sunderta se shabdon ko saheja hai bdhai

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