शुक्रवार, 3 फरवरी 2012
तुम भी चलो, हम भी चलें
होगी प्रचुरता कंटकों की, या सुमन की बहुलता
ज्योतिर्मयी होंगी दिशाएँ, या कुहासों से भरी
रजनी शिशिर की या अनल की वृष्टि करती दुपहरी
चलना नियति है; चेतना का है यही आधार भी
कर्तव्य भी अपना यही, बस है यही अधिकार भी
है अग्निपथ तो क्या हुआ, कटिबद्ध चलने के लिए
उच्छ्ल जलधि ले प्राण का, तुम भी चलो, हम भी चलें
अवरोध कितने ही मिलेंगे राह को रोके हुए
संकेत बहुतेरे दिखेंगे दिग्भ्रमित करते हुए
फुँफकारते विषधर बहुत से रुढ़ियों के भी खड़े
बहु झुंड होंगे वर्जना के नागफनियों से अड़े
पग पग मिलेंगी वासनाएँ ओर अपनी खींचती
औ' वृत्तियाँ कुत्सित डरातीं, मुट्ठियों को भींचती
पर नवसृजन का स्वप्न स्वर्णिम, चक्षु में अपने लिए
संबल बनाकर सत्य को, तुम भी बढ़ो, हम भी बढ़ें
हम अनवरत चलते रहें, हो तप्त कितनी भी धरा
हो वेदना कितनी सघन, हो पाँव छालों से भरा
जलते हुए वड़वाग्नि से है अब्धि कब विचलित हुआ
कब रोक पाया है जलद, नित अग्रसर रथ भानु का
कोई नहीं इतना सबल जो टिक सकेगा सामने
पावक, वरूण, क्षिति, वायु, नभ पलते मनुज के बाहु में
भर आत्म उर्जा से निरन्तर, मनुजता की राह में
सोपान नित उत्थान के, तुम भी चढ़ो, हम भी चढ़ें
शुक्रवार, 27 जनवरी 2012
पुनरावृत्ति
हम पुनरावृत्ति करते हैं
शब्दों की,
भावनाओं की,
क्रियाओं की,
और गढ़ते हैं
नई बातें...नई कविताएँ,
नए आकर्षण...नए रिश्ते,
नए संसाधन...नए प्रयोजन,
निरंतर...पूरे उत्साह से.
ऐसा नहीं कि
पुनरावृत्ति नीरस और उबाऊ नहीं होती...
..................होती है...
किन्तु, तब तक नहीं
जब तक
उससे नवीनता जनमती है.
बुधवार, 18 जनवरी 2012
बंधनरत
बल्कि जन्म के पहले से ही...
अस्तित्व-निर्माण की प्रक्रिया के समय से ही....
दृश्य- अदृश्य,
सुखद- कष्टकारी,
चमकीले- स्याह,
चाहे-अनचाहे बन्धनों में.
कुछ को वह चुनता है
कुछ को स्वयं बुनता है
कुछ लिपट जाते हैं उससे अनायास
अस्तित्ववश, प्रकृतिवश, जिजीविषावश .
कुछ चुभते हैं कँटीले तारों से
जिनसे छूटने को वह छटपटाता है
कुछ सहलाते हैं मृदुल फुहारों से
जिन्हें (स्वयं को) समर्पित कर वह तृप्ति पाता है.
किन्तु,
बँधा रहता है सतत...उम्र भर.
और जब तक बँधा रहता है
तभी तक "वह" रहता है
जब मुक्त होता है
पञ्च तत्वों में विलीन हो जाता है,
एक आह
एक नाम
एक याद बन जाता है.
बुधवार, 11 जनवरी 2012
वर्ण-व्यवस्था
तुमने राम को शबरी के जूठे बेर तो खिला दिए
किन्तु उसकी मिठास
तुम्हारे "मानस" तक ही रह गई.
तुम्हारे राम ने तो
रीछ, वानर और पक्षियों को भी भाई बनाया था
यहाँ, मानव की
मानव के प्रति संवेदनाएँ ही
वर्ण-व्यवस्था की राक्षसी निगल गई.
सोमवार, 9 जनवरी 2012
प्रतिदान
उसे रख लिया करो चुपचाप
मत सोचा करो कभी
उसके प्रतिदान के बारे में .
क्योंकि
मेरा हर दिया गया
तुमसे ही उपजता है
पहले मुझे भरता है
फिर उमड़कर तुम तक पहुँचता है.
मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011
नई बात
तमाशबीनो से घिरे वृत्त के भीतर
उसके चक्कर पूरा करने पर
तालियाँ पीटते हुए एक सिक्का भी फेंका होगा.
कभी कभी उल्टी बातें भी अच्छी लगती हैं
किन्तु,
सिर्फ कुछ देर रुक कर
भीड़ में खड़े हो जाने के लिए
कुछ देर,
नएपन से अचंभित होकर तालियाँ बजाने के लिए.
हर उल्टी बात नई नहीं होती है
बस नएपन का अहसास देती है
हर नई बात सही नहीं होती है
बस सही होने का आभास देती है
वह आदमी
जब हाथों के बल चलता है
बस तमाशबीनो से घिरे वृत्त में गोल गोल घूमता है.
कभी भी
कोई दूरी नहीं तय कर पाता है
और
एक गाँव से दूसरे गाँव तक
पैरों से ही चल कर जाता है.
रविवार, 4 दिसम्बर 2011
कुछ सामयिक दोहे
राशन है मँहगा यहाँ, सस्ता है ईमान
राजा- रानी तो गए, गया न उनका मंत्र
मतपेटी तक ही सदा, रहा प्रजा का तंत्र
सर्वाहारी क्यों इसे, बना दिया भगवान ?
ज़र,जमीन,पशु-खाद्य तक, खा जाता इंसान
गंगाएँ कितनी बहीं, 'बुधिया' रहा अतृप्त
जब जब है सूखा पड़ा, नेता सारे तृप्त
बापू , तुम लटके रहो, दीवारों को थाम
नमन तुम्हें कर नित्य हम, करते 'अपना काम'
सुखदतम यह होता है
हम किसी की कल्पनाओं के अनुरूप स्वयं को ढ़ाल लें
और उसके मन-मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाएँ.
सुखदतम यह होता है कि
किसी की कल्पनाओं का स्वरुप हमारे जैसा हो जाए
और वह हमें अपने मन-मंदिर में बसा ले
सारे गुण-दोषों के साथ.
सुखदतम यह नहीं होता कि
शुभ्र ज्योत्सना से आच्छादित पुष्प कुञ्ज में बैठ
हम अपने प्रिय के मुखमंडल की धवलता अपनी आँखों में भरें .
सुखदतम यह होता है कि
जब अमावस की रात में हम उसे देखें
दसों दिशाएँ धवल हो जाएँ,
उसके चेहरे के उल्लास से...उसकी आँखों की चमक से.
सुखदतम यह नहीं होता कि
हमारे जीवन पथ पर बस पुष्प ही बिछे हों
और हम उनकी कोमलता तथा सुवास में डूब कर चलते चले जाएँ.
सुखदतम यह होता है कि
हमारी राह का हर कंटक
हमारे नेह-जल से कोमल हो जाए,
हमारे मधुर-स्पर्श से सुवासित हो उठे.
सोमवार, 21 नवम्बर 2011
स्मृति
उस हर क्षण में
जिनसे होकर मैं गुजरता हूँ
अदृश्य, अगोचर…
विलीन हो हर मूर्त और अमूर्त में,
जो भी मेरे चक्षुओं
और मन की दृष्टि की परिधि में आता है.
जब भी तुम्हारा स्मरण मानस में उभरता है,
हर वस्तु आलोड़ित हो उठती है
किसी तरल की तरह
और उस पर डोलती हुई चंचल तरंगें
तुम्हारी आकृति उकेर देती हैं,
तुम्हारी मुस्कान बिखेर देती हैं
तुम मेरा प्यार हो.....
तरुणाई के स्वप्नों की मिठास हो
उषा की पहली किरन की उजास हो
मेरे प्रभात-वंदन का स्वर हो
अर्घ्य-पुष्प-चन्दन की सुवास हो
शिवाला के घंटों का अनुनाद हो
मेरी प्रार्थना का संवाद हो
आरती की ज्योति हो
जलार्पण की धार हो
तुम मेरा प्यार हो.
नीम की शाखों पर गौरैयों का गान
गंगा की लहरों पर किरणों का नृत्य हो
मेघ की तूलिका से अम्बर पर उभरा
मेरी कल्पनाओं का चित्र हो
साँझ के आँचल में पलती अस्फुट चाह हो
अंतिम प्रहर की ठंडी बयार हो
शरद के धूप की गुनगुनाहट हो
सावन की पहली फुहार हो
तुम मेरा प्यार हो
प्रथम बेला की पहली कामना हो
मेरे सर्व सुख की सकल साधना हो
मेरे हर आरोहण का अवलम्ब हो
मेरे हर अवरोहण की सांत्वना हो
मेरे सूक्ष्म का चिंतन हो
मेरे स्थूल का आलिंगन हो
मेरी भौतिकता की पूर्ण प्राप्ति हो
मेरी आध्यात्मिकता का चिरंतर आधार हो
तुम मेरा प्यार हो.
शुक्रवार, 18 नवम्बर 2011
करो सच्ची इबादत
उफ़नती मौज़ पर बनती हुई एक रहगुज़र देखो
ये उजली चाँदनी भी रात का ही इक नज़ारा है
न लिपटो बाँह से इसकी, बढ़ो, रोशन सहर देखो
किसी बच्चे की आँखों की चमक तुम रोप लो दिल में
क्षितिज तक झिलमिलाती रोशनी फिर उम्र भर देखो
बिना सोचे ही भागे जा रहे कब से अन्धेरे में
कहाँ जाती हैं ये राहें कभी पल भर ठहर देखो
कोई नफ़रत मुहब्बत से बड़ी होती नहीं यारों
मिटेंगी रंजिशें, दो बोल मीठे बोल कर देखो
झुका है चाँद कोई आज फिर दिल के समंदर पर
मेरे जज़्बात की लहरें मचलतीं किस कदर देखो
बृहस्पतिवार, 3 नवम्बर 2011
उत्थिष्ट हो !
मधुमय नहीं,
पुष्प पल्लव से सदा
रहता है आच्छादित नहीं.
यदि कंटकों की हो प्रचुरता,
पंथ मत तज
उत्थिष्ट हो !
चल पवन के संग तू.
निर्मल सदा
होता नहीं है हर सरोवर,
पंक मिश्रित अम्बु हो यदि,
श्वांस लेना हो जो दुष्कर ,
मत्स्य मत बन
उत्थिष्ट हो !
खिल जा कमल बन.
तू मलयगिरी की
सुवासित गंध बन.
इन्द्रधनु बनकर
चला स्यंदन गगन के भाल पर.
उज्ज्वल बने प्रत्येक कण
स्पर्श से,
हो जा प्रकीर्णित
भोर की पहली किरन बन.
पंथ यह मधुमय नहीं
उत्थिष्ट हो ! उत्थिष्ट हो !
चल पवन के संग तू ,
खिल जा कमल बन.
हो जा प्रकीर्णित
भोर की पहली किरन बन.
रविवार, 9 अक्तूबर 2011
रावण कभी भी तो न मारा जा सका
बस गात ही खंडित हुआ था
वाण से श्रीराम के.
वह प्रतिष्ठत है युगों से मनुज के भीतर,
सदा पोषित हुआ
आहार, जल पाकर
निरंकुश कामनाओं, इन्द्रियों का.
राम कोई चाप लेकर
खड़ा भी होता अगर है
लक्ष्य सारा-
मारना रावण सदा ही दूसरे का.
स्वयं का रावण विहँसता
खड़ा अट्टहास करता, दसो मुख से
सहम जाता राम
धन्वा छूट जाती है करों से.
यत्न सारा
विफल होता ही रहा
संहार का दससीस के.
बस प्रतीकों पर चलाकर वाण
है अर्जित किया उल्लास के कुछ क्षण मनुज ने.
किन्तु जब तक राम सबके
उठ खड़े होते नहीं संहार को
प्रथम अपने ही दशानन के,
सतत उठती रहेगी गूँज अट्टहास की,
सहमते यूँ ही रहेंगे राम
विहँसता रावण रहेगा सर्वदा.
बुधवार, 5 अक्तूबर 2011
आर्तनाद
मुझे एक अंतहीन नीरवता से आच्छादित करके.
मेरे तर्क
जो कभी मेरी मिथ्या श्रेष्ठता सिद्धि के वाहक होते थे,
आज मेरी तरफ भृकुटी ताने खड़े हैं.
मैंने तुम्हें चाहा था बहुत....पूरे अंतर्मन से...
हर पल तुम्हारी अभिलाषा की थी
हर क्षण तुम्हारी प्रतिच्छाया में ही लिपटा रहा
मेरे अन्तस्थ और बहिरत तुम ही रही
नहीं...मिथ्या हैं ये शब्द.....बिल्कुल मिथ्या !
सच तो यह है कि
मैंने चाहा था तुम्हारे चक्षुओं में
प्रतिष्ठित अपनी आकृति को
मैंने चाहा था मुझे निरख
तुम्हारे मुख पर प्रस्फुटित उल्लास को
मैंने चाहा था मुझमें राग भरते
तुम्हारे घन-केश, संदल-देह और स्नेहिल अंकमाल को
मैंने चाहा था, मेरे निमित्त
तुम्हारे हर क्रिया कलाप को
मैंने चाहा था तुममें
मात्र अपने आप को.
कहाँ चाह पाया था तुम्हें कभी?
कहाँ आत्मसात कर सका था तुम्हारे स्व को?
कहाँ विगलित कर पाया अपना स्वत्व तुममे.
कहाँ जी पाया एक क्षण के लिए भी "तुम' बनकर.
कुछ भी तो नहीं दे सका तुम्हें.
अपने अहम् का
एक अंश भी नहीं समर्पित कर सका.
अन्यथा तुम नहीं जाती....
तुम नहीं जा पाती....
यदि समर्पण का कुछ भार डाल दिया होता तुम पर
तुम नहीं अलग हो पाती
यदि स्वयं को थोड़ा मिला दिया होता तुममें.
किन्तु मैं ऐसा कर नहीं पाया...
और तुम चली गई
मुझसे निराश होकर.....
(स्वगत)
अजीब सी नीरवता है....
नहीं, यह नीरवता नहीं
मेरे खंडित अहम् का आर्तनाद है.
शुक्रवार, 30 सितम्बर 2011
तुम प्रेम-दीप
तुम राग-ज्योति
अंतह में मेरे प्रस्थापित,
उर-आँगन
जीवन-उपवन
हर पल प्रदीप्त
हर पल आलोकित.
तुम प्रेम-अब्धि,
तुम राग-सरित
हो हृदय-धरा पर
कल-कल वाहित
आनंद, हर्ष की
विपुल राशि तुम
भरती मुझमे जीवन-अमृत
तुम प्रेम-मेघ,
तुम राग-सलिल
झरती मुझमें
रिमझिम- रिमझिम
कण कण मेरे
प्राण-गात का
सरस, सिक्त, अतिशय मधुरिम.
हृदय, प्राण,
मन पर आच्छादित,
रोम रोम पर तुम अंकित,
तुममे मैं हूँ,
तुम मुझमे हो,
गात विलग, हिय एक किन्तु.
सघन स्नेह
साधे सौरभ,
मन मुग्ध, मुदित, मधुमय, मुकुरित.
प्रेम-पयोधि
प्रखर प्रवेग
अहा अनुराग ! अंतह अभिजित.
सोमवार, 16 मई 2011
एक राग-मय सुबह
पूर्व क्षितिज स्मित-कंचन
निर्झर में वाणी-गुंजन
इन्द्रधनुष तेरी चितवन
हँसी बिखरती पात पात
कितना मोहक यह प्रभात !
प्रेम-पवन अति उच्छॄंखल
राग-सरित बहती कल कल
चहुँ-दिश फैली ज्योति नवल
सुख सागर अतिशय उदात्त
कितना मोहक यह प्रभात !
रोम रोम मेरा मधु सिक्त
तार तार हिय का झंकृत
हर सूक्ष्म -स्थूल तुमसे आवृत
लहराता मन-प्राण-गात
कितना मोहक यह प्रभात !
सोमवार, 26 जुलाई 2010
रात कोई बात कह कर
नींद गहरी सो गई.
एक चिड़िया चोंच में उसको दबाकर उड़ चली
और जाकर भोर के माथे लगा दी...
बात अरुणिम हो गई
सूर्य रथ आगे बढ़ा, तो
बह चली वह बात,
चंचल रश्मियों की धार में .
अठखेलियाँ करती हुई,
झिलमिलाती माणिकों सी...
बात उजली हो गई.
चू पड़ी फिर,
दिवस के अवसान पर ,
वह क्यारियों में चम्पई सी साँझ की.
खिल उठी,
अतिशय सुवासित, सप्त-रंगी,
दिव्य अलौकिक पुष्प सी.
ढँक गई सारी दिशाएँ
रंग, आभा और मधुर सुवास से.
अँगड़ाईयाँ ले रात जागी,
अंजली में रोप ली....उर से लगाया...
घुल गई वह बात.
अब,
हर पल विहँसती रात...
हर पल निखरती रात...
हर पल महकती रात...
चहुँ दिश रंग, आभा और मधुर सुवास.
सोमवार, 19 जुलाई 2010
इतनी सी बात
हाँ... बस इतनी ही थी...
या यूँ कह लें कि,
इतनी ही बात निकली थी...
इतनी ही बात उठी थी...
इतनी ही बात फैली थी...
और
इतनी ही बात बिखरी थी...उसके शव के आस पास...
कि ".....नाहक ही जान चली गई"
शव के इर्द गिर्द,
मक्खियों की तरह भिनभिनाते,
जीवित शवों ने,
अपनी भीरुता के दंश का उपचार,
तर्कों की औषधि से शुरू कर दिया था.
चेहरे के शर्म की स्याही पर,
कर्तव्य और जिम्मेदारी की सफेदी पोती जा रही थी.
स्वयं के जीवित बचे रहने के लिए,
अपनी बुद्धि को मन ही मन सराहा जा रहा था.
तंत्री गण,
पटाक्षेप के उपरांत,
परिचारकों की भाँति,
मंच के सामानों को यथावत रखने की
जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गये थे.
कितनी शांति हो गई थी चारो ओर...
अगले मंचन तक की शान्ति.
सब कुछ थम सा गया था...
कुछ गतिशील थी तो बस वह बात-
"......नाहक ही जान चली गई"
सच में नाहक ही जान चली गई थी.
वह समझ नहीं पाया था कि ,
बस जी लेना...
बस जीते रहना ही....सर्वोपरि है.
नहीं स्वीकार कर पाया था,
कि यदि मनुष्य की तरह नहीं ,
तो मोटी खाल वाले,
अन्य जीवों की तरह जी लो.
अन्यथा...कोई भी वार हृदय तक नहीं पहुँच पाता.
प्रतिकार,
क्षण भर के लिए मन में बुलबुले सा उठता,
और फिर फूट जाता.
लेकिन वह करता भी क्या....
उसकी खाल बहुत पतली थी.....
बात बस इतनी सी थी.
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
सवैया
नागिन सी नथनी डसती, अरु माथ चुभे ललकी बिंदिया री !
कान का कुण्डल जोंक बना, बिछुआ सा डसै उँगरी बिछुआ री !
मोतिन माल है फाँस बना, अब हाथ का बंध बना कँगना री !
काजर आँख का आँस बना, अरु जाकर भाग के माथ लगा री !
हाथ की फीकी पड़ी मेंहदी, अब पाँव महावर छूट गया री !
काहे वियोग मिला अइसा, मछरी जइसे तड़पे है जिया री !
आए पिया नहि बीते कई दिन, जोहत बाट खड़ी दुखियारी .
मंगलवार, 29 जून 2010
हाइकु
घना जंगल
न पौधे न दरख्त
आदमी पस्त
(२)
बढ़ता हाट
बिकने लगे रिश्ते
कैसे जज़्बात ?
(३)
दूर किनारा
घिरने लगी साँझ
नाविक क्रान्त
(४)
ओष्ठ निःशब्द
मुखर हुआ मौन
बढ़ा घनत्व
(५)
पूर्ण ऐश्वर्य
निरंकुश इन्द्रियाँ
कैसे ये संत?
शुक्रवार, 25 जून 2010
आह पे क्यों इतना हंगामा हुआ है
अब दरीचों से महज हम देखते हैं
चाँदनी में भींगना सपना हुआ है
आसमाँ में उड़ रहे उजले कबूतर
रास्तों पे सुर्ख़ रंग बिखरा हुआ है
धुल न पाता, स्याह जो चेहरा हुआ है
बृहस्पतिवार, 17 जून 2010
मुझ पर बहुत जियादा
मुझ पर बहुत जियादा वो नज़रे-करम रखते हैं
जो हम न सुख़नवर, न सही, ज़ौक़े-सुख़न है कुछ तो
(परवाज़= उड़ान; शीरो-आब =दूध और पानी; नज़रे-दुदम= दोधारी नज़र; आबे-ज़ीस्त-ओ-सम= अमृत और विष; सुखनवर= कवि, ज़ौक़े-सुख़न= काव्य का शौक; बज़्मे-मज़ा-ए-दर्द= दर्द के आनंद की महफ़िल )
मंगलवार, 1 जून 2010
चिट्ठियाँ
हर शब्द में मुस्कान है, कागज़ है नम मगर
रोते हुए हँसती हो, बतलाती हैं चिट्ठियाँ
कोरे लिफाफे की वे तड़पाती हैं चिट्ठियाँ
पहचान लेतीं छू के अंधी माँ की उँगलियाँ
जब मन ठिठुरता याद की ठंडी हवाओं से
कुछ गुनगुनी सी धूप बिखराती हैं चिट्ठियाँ
चुपचाप सिरहाने से भीगी रात में निकल
तनहाइयों के ज़ख्म सहलाती हैं चिट्ठियाँ
बृहस्पतिवार, 27 मई 2010
सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गया
अच्छा हुआ वो आँख मेरी नम जो कर गया
मौजें बहा के ले गईं कदमों के सब निशां
बादल बरस के फिर से हरा घाव कर गया
मैंने तो कोई आइना तोड़ा नहीं कभी
फिर भी न जाने अक़्स मेरा क्यूँ बिखर गया
बस मोम का लिबास था ज़ख्मों के ज़िस्म पर
हमदर्द इक नज़र जो पड़ी तन उघर गया
मंगलवार, 25 मई 2010
जंगल की हवा अब तो शहरों में भी चलती है
अब चाँद सितारे भी हैं हद से नहीं बाहर
तुझमें जो है उफान, सबब, तेरा उतरना है
टोपी में लगा लो चाहे जितनी कलँगियाँ तुम
पर बाँग से मुर्गे की कभी पौ नहीं फटती है
(पुर-दर्द= दर्द भरी, निदा- आवाज, बू-ए-ग़ोश्त = मांस की गंध )
(लकीरे-बख़्त = भाग्य की रेखा )
(शब-सर्द = ठंडी रात )
बृहस्पतिवार, 13 मई 2010
आँचल माँ का
हर शै थी अन्जान यहाँ
मैं सिर्फ जानता आँचल माँ का
उन नन्ही आँखों की धरती,
आसमान था आँचल माँ का
हर पीड़ा, दुःख, डर मिट जाता
उस वितान के नीचे आकर
बचपन के माथे पर उभरा
हर गुमान था आँचल माँ का
तरुणाई की आँखों में जब
सपनों के अंकुर फूटे
उनके पोषण हेतु हवा, जल
और उजास था आँचल माँ का
हास-व्यथा, उल्लास-हताशा
एक साथ थे यौवन पथ पर
स्नेहिल हाथों से, मन का
हर भाव थामता आँचल माँ का
जग के रीति-रिवाजों में
परिपक्व हुआ मैं किन्तु अभी भी
फाँस कोई चुभती जब दिल में
दर्द ढूँढता आँचल माँ का
कैसे माँ की छवि, ममता, -
व्यक्तित्व सभी का गान करूँ
मेरे सारे शब्दों में भी
नहीं समाता आँचल माँ का
रविवार, 9 मई 2010
आँच गर ज्यादा करोगे रोटियाँ जल जाएँगी
सब्र से सेंको, चिता की आग के सौदागरों !
आँच गर ज्यादा करोगे रोटियाँ जल जाएँगी
मंगलवार, 4 मई 2010
ये चाँद जो उजला दिखता है
बस तेरी नज़र का धोखा है
है सारी उमर बहता रहता
आँखों में कहीं इक दरिया है
पहचान इन्हें कैसे होगी
हर आँख चढ़ा इक चश्मा है
तू देख के दाना चुगना रे !
वो जाल बिछाए बैठा है
हर रात बिताता आँखों में
यह शहर भी मुझ सा तनहा है
जीने की उसे है चाह बहुत
मरने की दुआ जो करता है
इसका भी तो हक़ है पलकों पर
यह अश्क़ भी मेरा अपना है
मत शोर मचा, जग जाएगा
अब ख़्वाब बहुत ही मँहगा है
जब इश्क़ चढ़े फिर ना उतरे
यह रंग बहुत ही गहरा है
सोमवार, 3 मई 2010
इस तरह दिल की लगी अपनी बुझाता है
दिल्लगी के वास्ते मुझको बुलाता है
पैर रख काँधों पे वो ऊँचा उठा कितना
शौक़ से ख़ुद दास्ताँ अपनी सुनाता है
अजनबी हूँ शहर में किस ओर मैं जाऊँ
जिससे पूछो वो अलग रस्ता बताता है
मिल न पाया जो कभी ख़ुद से न दुनिया से
रोज ही भगवान से सबको मिलाता है
शहर में जिस ओर देखो बस मुखौटे हैं
चेहरा कोई नहीं असली दिखाता है
मैं कहीं भी जाउं मुझको ढूँढ ही लेगा
गम है वो, इंसान मैं, गहरा ये नाता है
दिल धड़कता है बिना यहसास के अब तो
यह भी औरों सा ही बस रिश्ता निभाता है
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गया
एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गया
दूर तक बस राह में आलम ख़ला का रह गया
जो चला था खूँ जिगर से उमड़ के तूफ़ान सा
आते आते आँख तक वो सिर्फ पानी रह गया
हो गयीं तनहा मेरी पलकें भी अब तो एकदम
हमनफ़स इक ख्वाब ही था, आज लेकिन वह गया
उम्र भर देता रहा जो हर परिंदे को पनाह
वह शज़र कल रात की बारिश में सहसा ढह गया
ढूँढती है राह सूनी, चाँद की परछाईयाँ
आज भी आया नहीं वो, किस हवा सँग बह गया
जाते जाते इक परिंदा गुलसितां से कह गया
ज़िन्दगी यूँ भी चली, यूँ भी चलेगी ज़िन्दगी
जो बढ़ा वो पार निकला, जो थमा वह रह गया
रविवार, 24 जनवरी 2010
प्रीति के दोहे
हर अमूर्त औ' मूर्त में, रुप दृष्टिगत एक
रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण
पढूँ, गुनूँ आठो पहर, तुममें ही निर्वाण
नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार
डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार
सुबह, तुम्हारी ही हँसी, दुपहर, मधुरी बैन
साँझ तुम्हारी प्रीति है, आलिंगन है रैन
पुष्प, तुम्हारी स्निग्धता, आभा पाया भोर
वाणी ले सरगम बना, पाया प्रीत चकोर
बुधवार, 6 जनवरी 2010
प्रणय राग
मैंने इस कविता में प्रेमी-युगल के प्राण-गात के पूर्ण विलय के क्षणों में उभरे भावों और प्रक्रियाओं को शब्द बद्ध करने का प्रयास किया है.
पल था कोई चेतनता का
या वह सुन्दर एक सपन
अर्द्ध रात्रि की नीरवता में
दो प्राणों का महामिलन
पुष्प वाटिका के प्रांगण में
पत्रों पुष्पों का आसन
तुम रति की प्रतिमा बन बैठी
मैं प्रेमी, रत-आराधन
भू पर फैली शुभ्र ज्योत्सना
तारक गण से भरा गगन
मंद पवन के मलयज झोंके
सहलाते सुरभित कुंतल
चक्षु तुम्हारे, नेह सरोवर
लहराते मद्धम मद्धम
अंजलि भर भर नयन लगाता
चिर-निमग्नता चाहे मन
स्पर्श मिला जब अंगुलियों का
हुआ विकंपित सारा तन
नेह-वृष्टि नयनो की पाकर
उठी एक मादक सिहरन
पूर्व क्षितिज की प्रात अरुणिमा
फैल गई कोमल मुख पर
फड़क उठीं रक्तिम पंखुड़ियाँ
नेह निमंत्रण था अनुपम
मचल उठा अंतह का चातक
देख अधर पर स्वाती-जल
जीवन भर की प्यास बुझा लूँ
पी लूँ पल में अमिय सकल
तत्क्षण झुका सुमन पटलों पर
सम्मोहित हो भ्रमर-अधर
करने लगा सिक्त प्राणों को
मधुरस का मादक निर्झर
लिपटी देह बेल सी पल में
कंठ-करों का अवगुंथन
मुँदने लगे चक्षु द्वय मद से
मधुर मदिर वह आलिंगन
बाहर मधु, अन्दर बड़वानल
पल पल होते तप्त अधर
बढ़ने लगा वेग धमनी में
उत्तेजित अति हुआ रुधर
घुलने लगी स्वाँस स्वाँसों में
सघन ताप भर निज अंतर
गीष्म काल का उष्ण समीरण
ज्यों बहता है तृतीय प्रहर
स्पंदन दो हृदयों का बढ़ता
हर क्षण बढ़ता सम्मोहन
आतुरता के तुंग शिखर पर
विलग गात से हुए वसन
उठा ज्वार सा अंतह में ज्यों
झुका चन्द्र हो वारिधि पर
कंचन गात दृष्टिगत केवल
चहुँ-दिश ढँका अवनि अम्बर
ज्योति पुंज सी फूट रही थी
अंग अंग माणिक झिलमिल
या सत निर्झर बहते मधु के
सम्मोहक मादक उर्मिल
या फिर उतरा देवलोक था
कण कण में आनंद नवल
हर पग खिले सुमन बहु, सुरभित
तन मन करते उत्श्रृंखल
निर्बाध बढ़ा, अति लालायित
मैं पूर्ण प्राप्ति के पथ पर
ज्यों भादों का मेघ चला हो
बाहों में चपला भर कर
श्रृंग गर्त में विचरण करता
कुच-कलशों से मधु पीकर
उन्मत्त हुआ मन चाह उठा
वहीं विचरना जीवन भर
लगे डूबने सुधा सरित में
हृदय-गात दो बंधन-रत
लिखने लगे प्रणय गाथा फिर
तन, मन दोनों के अविरत
कभी तनी तुम चित्र पटल सी
चित्रकार मैं अति तन्मय
पोर पोर पर छवि उकेरता
प्रेम राग मधु सुधा प्रणय
कभी हुई वीणा सी झंकृत
पाकर मधुरिम नेह-छुवन
फूटा जीवन राग मधुरतम
गुंजित हुआ सकल उपवन
कभी हुई मुखरित बंशी सी
रखा तुम्हें जब अधरों पर
कभी कूक कोयल की फूटी
धड़के प्राण गात जुड़कर
खिंचा हुआ था चाप सदृश तन
ज्यों प्रत्यंचा चढ़ा प्रबल
गूँजे गुरु टंकार चतुर्दिक
शर संधान करूँ जिस पल
अग्नि प्रज्ज्वलित थी यौवन की
ज्यों जलता हो खाण्डव वन
लपट पुंज उठते प्रदग्ध अति
बूँद बूँद पिघलाते तन
या प्रतप्त था हवन कुण्ड ज्यों
आम्र शाख सा जलता तन
लपटें पकड़ रही लपटों को
आतुर हो होकर हर क्षण
नीचे वसुधा ऊपर अम्बर
झूला बना पुष्प उपवन
पेंग बढ़ा संपृक्त प्राण-द्वय
पल पल छूते सप्त गगन
वाजि बना वह काल खण्ड, हम
करते द्रुत अश्वारोहण
बढ़ रहे लाँघते मद-सरिता,
मधु-गिरि औ' मादक-कानन
नाद युक्त उच्छ्वास तप्त हो
द्रुत गति से बहता अविरल
तन आच्छादित स्वेद कणों से
ज्यों बिखरा हो वर्षा-जल
पहुँचे हम उत्तंग शिखर पर
जहाँ डोलता सुधा जलद
गूँज उठा घननाद प्रबलतम
लगा बरसने लरज लरज
सिक्त हुआ प्राणों का कण कण
अंतह अति सुरभित, मधुमय
तरल हुए हिम खण्ड पिघलकर
हुआ परस्पर पूर्ण विलय
थमा ज्वार, थी शांति चतुर्दिक
लहराता तन मन उपवन
आधिपत्य औ पूर्ण समर्पण-
एक साथ, था महामिलन
मंगलवार, 29 दिसम्बर 2009
पल भर को तुम मुड़कर तकना
पल भर को तुम मुड़कर तकना
आँसू के कुछ कतरे तन पर
ओस सरीखे पड़े हुए हैं
फूल तुम्हारे मुस्कानों के
अंग हमारे जड़े हुए हैं
सपनों के नन्हे नन्हे से
कितने पौधे खड़े हुए हैं
कभी किसी एकाकी पल में
जिनको बोया मेरे अँगना
पल भर को तुम मुड़कर तकना
कभी मिलन में हुए उल्लसित
प्रियतम को बाहों में भरकर
कभी विरह में रोया तुमने
मेरे काँधों पर सिर रखकर
खोने पाने औ सुख दुःख का
रहा सदा साक्षी मैं हर पल
आज मेरी अंतिम बेला में
जाते तुम, पल एक ठिठकना
पल भर को तुम मुड़कर तकना
नव वर्ष तुम्हारा हो मंगलमय
मैं अतीत हो जाऊँगा
कालचक्र के महाजलधि के
अंतह में सो जाऊँगा
कभी किसी अलसाए पल में
याद तुम्हें जो आऊँगा
नाम मेरा अधरों पर अपने
मुसकाकर हौले से धरना
पल भर को तुम मुड़कर तकना
मंगलवार, 22 दिसम्बर 2009
अहर्निश
कुछ फर्क नहीं पड़ता
मेरे चीखने से, चिल्लाने से,
जीवन के शतरंज पर
शब्दों की गोटियाँ चराने से।
कुछ भी तो फर्क नहीं पड़ता,
जलती क्षुधाओं को
बेबस आँसुओं को
कलपते तन-मन को
शब्दों की चाशनी में पकाने से।
मैं यह भी जानता हूँ कि
जो उबलता है अन्दर
तप्त लावे की तरह,
सतह पर आते ही
हो जाता है शीत युक्त...
जम जाता है हिम खण्डों सा,
स्पर्श मात्र से ही
ज़माने की ठंडी हवाओं के।
फिर भी
उस उबाल को
उस उफान को
रोकता नहीं
क्योंकि
कम से कम
इतना अहसास तो होता है कि
कड़ाह के नीचे आंच है
और शायद इतनी उम्मीद कि
कभी तो, कुछ तो पिघलेगा।
पल भर के लिये ही सही
मन की सतह क्षैतिज तो हो जाती है।
मंगलवार, 3 नवम्बर 2009
जन्मों तेरा ही नाम लिया है
जन्मों तेरा ही नाम लिया है मैंने
जां, तब तेरी उल्फ़त को जिया है मैंने
ज़िंदा रहे ये रूह तेरे आने तक
बस इसलिए घावों को सिया है मैंने
ये तिश्नगी शादाब रहे, इस खातिर
सावन कई, आँखों से पिया है मैंने
आकर मुझे जो आज छुआ है तुमने
ख़्वाबों को फिर से पंख दिया है मैंने
इक रोज तुम आओगे पता था मुझको
ताउम्र दिल को पाक किया है मैंने
शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009
दोहे
जो माटी से तन बना, महता कम ना होत
बिन दीया कैसे भला, जलती कोई जोत
पोथी सब कंठस्थ, पर, खुली न मन की गाँठ
नलिका* पर लटका हुआ, तोता करता पाठ
मिलन विरह दोनों सुखद, प्रेम करे यदि वास
कस्तूरी सा, हृदय में, फैले मधुर सुवास
सुलगे भुस तो देर तक, धुँआ भरे आकास
तिनका जलता एक पल, देता अग्नि, उजास
मसिहा बनने की रही, सदा मनुज की चाह
पर सबसे बनती नहीं, पानी ऊपर राह
रात दिवस लड़ता, मगर, पार कभी ना पाय
चक्रव्यूह गढ़ आप ही, ढूँढे स्वयं उपाय
आधिपत्य, प्रतिदान, गुण, होते नहि आधार
इसीलिए सबसे विलग, होता माँ का प्यार
मृत्यु भले ही जगत में, सबका अंतिम सत्य
मरण नहीं जीवन बिना , जीवन पहला सत्य
*नलिका पर.....----- (कदाचित कुछ लोगों को यह सन्दर्भ न ज्ञात हो) पहले के ज़माने में तोता पकड़ने के लिए नलिका लगाते थे। जब तोता उस पर बैठता था तो नलिका घूम जाती थी और तोता उल्टा लटक जाता था. वह गिर न पड़े इस डर से नलिका को और जोर से पकड़ लेता था. और बहेलिया आकर उसे पकड़ लेता था. एक बार एक साधु ने एक तोता पाला और उसे पकडे जाने से बचने का उपाय बताया -
१। नलिका पर कभी मत बैठना
२। अगर बैठ भी जाना तो नलिका जैसे ही घूमे उसे छोड़कर उड़ जाना।
तोते ने रट तो लिया लेकिन समझ न सका और एक दिन नलिका पर जाकर बैठ गया। नलिका घूमी और वह उलटा लटक गया. नलिका को जोर से पकड़कर पाठ दुहराने लगा -- १. नलिका पर कभी मत बैठना २. अगर बैठ भी जाना तो नलिका जैसे ही घूमे उसे छोड़कर उड़ जाना.
मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009
इरादतन मैंने किया
इरादतन मैंने किया; इल्ज़ाम लेने दो
मेरे गुनाहों को मेरा अब नाम लेने दो
चलना अगर आता उफ़क भी पार कर लेता
बैसाखियों को धड़कने तो थाम लेने दो
झुक कर जरा सिर से हटा दो सख्त मिट्टी को
इस बीज को भी इक नया आयाम लेने दो
दुश्वार ना हो जाय, चलना दोपहर में कल
इन गेसुओं से एक कतरा शाम लेने दो
साहिल मिलेगा या भँवर, है बात किस्मत की
बस डूबने वाले को तिनका थाम लेने दो
बुधवार, 14 अक्तूबर 2009
दिल लगाने से हम तो डरते हैं
दिल लगाने से हम तो डरते हैं ।
ग़म उठाने से हम तो डरते हैं ।
कुछ भरम दिल के टूट ना जाएँ ,
आज़माने से हम तो डरते हैं ।
कब किसी बात का हो अफ़साना,
इस ज़माने से हम तो डरते हैं ।
फिर रुला दें तुझे न वे नग्में,
गुनगुनाने से हम तो डरते हैं ।
हो न जाओ सनम! कहीं रुस्वा,
पास आने से हम तो डरते हैं ।
मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009
मेरे जज़्बात तुम बिन कम न होते
ख़ुशी से रूबरू पर हम न होते।
रुतें आतीं तेरे बिन भी जहां में,
बहारों के मगर मौसम न होते।
कभी ना रंगे-उल्फ़त देख पाता,
अगर इस दिल के तुम हमदम न होते।
ख़लाओं में भटकती ज़ीस्त तुम बिन,
किसी मंज़िल के राही हम न होते।
शुआ-ए-रुख़ से अब दिन रात रोशन,
तेरे बिन ये हसीं आलम न होते।
मेरी ही रूह का हो एक हिस्सा,
न मिलते जो; मुक़म्मल हम न होते।
सोमवार, 5 अक्तूबर 2009
मेरा गुलसितां था नया नया
क्यूँ ख़बर खिज़ाओं को मिल गई, मेरा गुलसितां था नया नया
जो न मंज़िलें हैं नसीब में, मुझको न कोई मलाल है
बस ख़त्म हो न कभी मेरे कदमो तले है जो रास्ता
उस शाम पाकड़ के तले तुमने गले जो लगाया था
इन सर्दियों में हरारतें वही ओढ़ के अब चल रहा
हर बार देते हैं ज़ख्म वे, हर बार ही हम सोचते
जो गई वो बात बिसार दे, जो भी हो गया वह हो गया
न ये आख़िरी है पड़ाव ही, न ही आख़िरी ये मुकाम है
उस पार जाकर रूह बस पहनेगी इक कपड़ा नया
बुधवार, 23 सितम्बर 2009
नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए
नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए
चल रहे हम फिर भी लेकिन लब सिले हुए
आईने को देख रोया जार जार मैं
मुद्दतें थीं हो चुकीं ख़ुद से मिले हुए
आस उड़ने की लिए, बस मैं खड़ा रहा
आसमाँ तो था खुला, "पर" थे सिले हुए
कबसे आई है नहीं तेरी हँसी यहाँ
एक अर्सा हो गया अब गुल खिले हुए
ये हमारी बेवफाई का सिला नहीं
चल गयी जो चाल किस्मत, फासले हुए
सोचती हर रात ही वह "कल वो आएगा,
हो चुकी है देर अब तो दिन ढले हुए"
खुशबुएँ हाथो से उनके अब भी आ रहीं
क़त्ले गुल की साजिशों में थे मिले हुए
रविवार, 20 सितम्बर 2009
जब पास हमारे तुम होती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
त्राण सदृश, अस्तित्व तुम्हारा, मुझको ढँक लेता है
दुःख, चिंता के हर प्रवेग को बाधित कर देता है
प्राणों को कर प्रणय सिन्धु, सुख की तरिणी खेता है
मेरे हिय की हर पीड़ा का
पल में क्षय तुम कर देती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
नेह तुम्हारे नयनों से मृदु निर्झर सा झरता है
हृदय-धरा के कण कण को यह प्रेम सिक्त करता है
धुल जाती धारों से रस के सारी उन्मनता है
उर-धरणी पर निर्मल शीतल
सुख-सरिता सी तुम बहती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
सुरभित मंद झकोरों सा है अनिल स्वाँस का बहता
मेरी साँसों में भरता है मलयज की शीतलता
लुप्त म्लानता पल में करती है इसकी मादकता
मन मेरा उपवन बन जाता
तुम ऋतुराज बनी होती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
घेरे में कोमल बाहों के , मन सुध-बुध खोता है
मंजुल स्वप्नों से आच्छादित प्रणय जगत होता है
क्लेश व्यग्रता कब कोई भी हर्षित मन ढ़ोता है
निज प्राणों को मेरे प्राणों
के आँगन में बो देती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
अंतर्मन से उठकर, भावों के अक्षर आते हैं
मुखमंडल के स्निग्ध पृष्ठ पर, जुड़ते वे जाते हैं
प्रेम गीत, अधरों पर शब्दों के, कुछ लहराते हैं
मैं तन्मय पाठक होता हूँ
तुम जीवन-कविता होती हो
कितना अच्छा होता है जब
पास हमारे तुम होती हो
शुक्रवार, 18 सितम्बर 2009
सत्य ! तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।
सत्य !
तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।
चेतनता के प्रथम पग पर ही
मुझे ओढ़ा दिए गए
आवरणों के रंध्रों में छुपे
तृष्णा के असंख्य नन्हे विषधरों
के निरंतर तीक्ष्ण होते गए विषदंतों से
क्षत विक्षत,
अचेतना के भँवर में डूबते उतराते,
तुम्हारे गात को
अपनी आँखों में भरना चाहता हूँ.
प्रचलन और परिपाटियों से जन्मे,
मेरे भ्रामक अहम की
जिजीविषा के लिए,
तुम्हारे हिस्से की रोटी छीनकर,
अनवरत तुम्हें भूखा रख कर,
हड्डियों पर चढ़े खाल का
पुतला बना दिए गए
तुम्हारे बदन को
स्पर्श करना चाहता हूँ.
मेरी निरर्थक
श्रेष्ठता सिद्धि के
निरंतर बढ़ते गए
दबावों से झुक कर
दुहरा हुए
तुम्हारे मेरुदंड को
स्व के साहस की
खपच्चियों का सहारा देकर
उन्हें पुनः सीधा कर
तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ.
सत्य !
तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ...
एकाकीपन के पर्दे में छुपकर नहीं...
लज्जा के घेरे में सिमटकर नहीं...
जुगुप्सा की पर्तों में लिपटकर नहीं...
अपितु
अपना सम्पूर्ण आत्मबल सहेज,
तुम्हारे रुग्ण तन मन को व्याधि मुक्त कर...
मन की सतह पर उग आयीं
वर्जनाओं और निषिद्धियों की
कटीली झाड़ियों को नष्ट कर...
सम्पूर्ण जगत के समक्ष,
पूर्णतः प्रेम युक्त हो,
पूरे मान और अभिमान के साथ
तुम्हें जीना चाहता हूँ.
सोमवार, 14 सितम्बर 2009
जुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं
आह हाथों की लकीरों को बदल सकती नहीं
जुगनुओं के ताप से कोई फसल पकती नहीं
यूँ कभी कुछ देर मन बहला भले देती है यह
नाव कागज़ की नदी तो पार कर सकती नहीं
कालिखें कितनी पुतेंगी और अब इतिहास पर
बह रही खूँ की नदी जो, क्यों कभी रुकती नहीं
जबसे ख़ुद की है दिखी तस्वीर चश्मे -यार में
शै कोई भी दूसरी आँखों में अब टिकती नहीं
ज़ब्त करना सीख लो ग़म, क्योंकि चीखों से कभी
आसमाँ झुकता नहीं है, ये जमीं रुकती नहीं
मंगलवार, 8 सितम्बर 2009
आगे कहानी और है
यह नहीं, मैंने लिखी जो, वह कहानी और है
स्याह पर्दे में बिलखती यह जवानी और है
मत उतारो काठ की नावें नदी में साथियों !
उठ रहे शोले धधकते, आज पानी और है
नींद में चलते हुए ठोकर लगी, जाना तभी
ख्वाब तो कुछ और थे पर जिंदगानी और है
लग रहा, ये आ रहीं छूकर तेरे रुखसार को
आज इन मादक हवाओं की रवानी और है
धड़कने, आहें, कसक, आँसू , तराने सब वही
पर सभी आशिक कहें- "मेरी कहानी और है"
आईने पर, लौटकर बाज़ार से, डाली नज़र
यूँ लगा यह तो नहीं सूरत पुरानी, और है
हो गयीं आँखें तुम्हारी नम अभी, ऐ हमनफ़स !
सिर्फ यह शुरुआत थी आगे कहानी और है
शुक्रवार, 4 सितम्बर 2009
अंतहीन संघर्ष
एक अजगर
एक प्रेत
और एक गिद्ध
तीनो ही
जन्म लेते हैं
आदमी के साथ ही
आदमी के भीतर ही
अजगर,
जो भी पाता है
खा जाता है
उम्र भर खाता रहता है
परन्तु
सदा ही भूखा रहता है
प्रेत,
भिन्न भिन्न आकृतियाँ गढ़ता है
सारी उम्र डराता है
रचाता है अनेकों ढोंग
इधर उधर भगाता है
गिद्ध,
बार बार गडाता है
अपनी नुकीली चोंच
शरीर में
सारी उम्र पीड़ा देता है
आदमी
बार बार उठता है
अपने पौरुष को टटोलता है
कमर कसता है
लडता है
किंतु
कभी भी पार नहीं पाता है .
बुधवार, 2 सितम्बर 2009
दर्दे मोहब्बत भी दिलकश ही तो होता है
यह दर्दे मोहब्बत भी दिलकश ही तो होता है
जब रात के साए में, है चाँद जवाँ होता
इक बीता हुआ लम्हां कुछ ख्वाब सँजोता है
"वे" नर्म बिछौनो पर करवट ही बदलते हैं
"वो" सख्त जमीं पर भी बेसुध होके सोता है"
जीने के नहीं काबिल दुनिया अब" कहता है-
वह रोज मगर; फिर भी इक साँस को रोता है
शहनाई की गूँजों से इक आह सी उठती है
फिर आज कोई खूँ से दामन को भिगोता है
सोमवार, 31 अगस्त 2009
अभिसार
वह पूनम की रजनी थी
कुछ उजली सी, कुछ नम सी
तुम चन्दा सी उतरी थी
फिर बरसी थी सावन सी
वह दिवस आज भी पलता
है हर पल उर में मेरे
जब मयूख बन छिन्न किए
जीवन के सघन अँधेरे
अब हर पल सिंचित करतीं
उपवन को मृदुल फुहारें
सावन रहता नभ मेरे
झरतीं हैं रस की धारें
अब चाँद उतरकर नभ से
मेरे आँगन सोता है
अब मेघ नित्य ही द्वारे
नव इन्द्रधनुष बोता है
सुख-सुमन विविध रंगों के
छिटकाती हँसी तुम्हारी
जीवन-आँगन अब मेरा
रमणीय एक फुलवारी
कातर नयनो से तकते
जो पलकों के घेरे से
तुम उन्हें खींच ले आती
रख देती सम्मुख मेरे
मृदु स्पर्श तुम्हारा पाकर
धर मूर्त रुप आ जाते
सपने सारे ही मेरे
अब प्राण गात हैं पाते
प्रथम किरण की आभा सी
उर को रहती हो घेरे
शीतल पावन गंगा सी
हिय में बहती हो मेरे
मुख ज्योति ज्योत्सना जैसी
मुस्कान मोह के डेरे
साँसें चलती हैं जैसे
मलयज के मंद झँकोरे
घन लेकर कुंतल से ही
घनघोर बरसता सावन
वाणी की वीणा से ही
सुर को मिलता है जीवन
सुनते जब नयन हमारे
नयनों की मधुरी वानी
विस्मृत जग होता पल में
नव लोक करे अगवानी
कर-हृदय पकड़ तुम लेती
ले जाती हो उस पथ पर
मंजुल सपने सब पलते-
थे, जहाँ आस के तरु पर
वे दिवस सुनहले कितने
अलसाए तरुणाई के
दबे पाँव तुम आ जाती
चुपके से अँगनाई में
मृदु करतल से ढँक लेती
थी बंद दृगों को मेरे
उच्छ्वास तुम्हारा निर्मित
करता संदल के घेरे
सोमवार, 24 अगस्त 2009
राँझे फना होते हैं अब भी प्यार में
नाव हमने डाल दी, चढ़ती नदी की धार में।
तुम बड़े नादान हो जो रूह लेकर आ गए,
सिर्फ कीमत जिस्म की है अब यहाँ बाज़ार में।
रात के अंतिम पहर तक सिसकियाँ आती रहीं,
एक बरगद कट रहा था, काठ की दरकार में।
पीटते हो ढोल जाने किस तरक्की का यहाँ,
भूख, भय, बीमारियाँ हैं ज्यों की त्यों संसार में।
बाप के हालात से अनजान बच्चों को तो बस,
आस रहती है नए कपड़ों की हर त्यौहार में।
मानता हूँ मैं कि यह तब्दीलियों का दौर है,
पर कई राँझे फना होते हैं अब भी प्यार में।
बुधवार, 19 अगस्त 2009
उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है
बस्तियाँ काँटों की हैं, पर हाथ में नश्तर नहीं है ।
है अजब ही खेल ऐ मौला ! तुम्हारा इस जहां में,
डूबता कोई, किसी को बूँद तक मयसर नहीं है ।
उन सवालों को भला क्यों, फिर से तुम दुहरा रही हो,
ज़िंदगी ! जिनका हमारे पास कुछ उत्तर नहीं है ।
आज है कोई गुमाँ, मुझको नहीं कोई भुलावा ,
ख्वाब के सिर पर लगा सुरखाब का अब पर नहीं है ।
आँधियों में घिर रहा जलपोत है इक नस्ल का फिर ,
पर भला उनकी खता क्या, गर कोई रहबर नहीं है ।
इश्क औ' मरजाद दोनों ही, सनम! कैसे निभेगी ?
है हथेली में तेरे पर नाम माथे पर नहीं है ।
हो सकेगी गुफ्तगू भी अब भला कैसे हमारी
अब वहाँ, उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है ।
बृहस्पतिवार, 6 अगस्त 2009
दोहे -प्रेम और श्रृंगार के
अन्दर मेरे तुम प्रिये , बाहर तुम ही होय
जित देखूँ तित तू दिखे , और न दूजा कोय
मैं तो, अब मैं ना रहा, तुम-मय भीतर वाह्य
तेरा ही मन प्रान प्रिये , जब से कन्ठ लगाय
अंध कूप में था पड़ा, लिये सघन अँधियार
अमिट उजाला छा गया, झाँके वे इक बार
तम ही तम फैला रहा, अवनि और आकाश
जग उँजियारा हो गया , मिलिया प्रेम-प्रकाश
तुमसे ही तो हर ख़ुशी , तुमसे ही सब नेह
जब चितवत हो तुम मुझे , बरसत मधु का मेह
पास सदा ही वे रहें , चाहे मन बेचैन
उनको ही देखा करुँ , आठ पहर दिन रैन
बैठ अटारी दोपहर , गोरी खोले केश
सोचे यह मन बाँवरा , साँझ भई इह देश
गोरी भींगे केश जो , फेरे है छिटकाय
टपके रिमझिम बूँद, यों , बरसत घन इतराय
अलकों में है घन बसा , साँसन मधुर सुवास
चितवन में अनुराग है , अधरन में मधु मास
चंदा चमके व्योम पर , चंदा अँगना सोय
दुइ दुइ चंदा देख के , हृदय मयूरा होय
देखन जब उनको लगा , और न देखन जाय
देख देख छवि सुमुखि की, प्यासे नैन अघाय
प्रिय की अति चंचल हँसी, कल कल सरित प्रवाह
हिय को आह्लादित करे, मिटे सकल दुःख दाह
बातें जब वो बोलती , झरन लगे हैं फूल
रोपे मन भर अंजुली , अर्घ्य देय हिय कूल
गोरी बैठी आँगना , देखन में सकुचाय
देख अँगूठी बीच छवि, मन ही मन मुसकाय
मन मेरा यह बाँवरा, वश में मोरे नाय
बैठ रहा उस ठौर, तुम ,जहाँ लिए लिपटाय
लिपटी हो तुम बेल सी , ऊँगली डोलत केश
चंचल लोचन राग का, देते हैं सन्देश
झरते हो तुम इस तरह , जैसे झरती ओस
साँसे घुलती साँस में , खोता जाता होश
शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
अभीष्ट
तुम्हारे
घन-केश की
शीतल छाँव को ही
मान लिया था
मैंने अपना अभीष्ट,
जब तक
नहीं भींगा था
तुम्हारे हृदयाकाश से झरते
शीतल फुहारों में ।
तुम्हारी
सीप सी सुन्दर,
झील जैसी गहरी
पनीली आँखों में ही
डूब जाने का स्वप्न देखा था,
जब तक
अनजान था
तुम्हारे अंतह में उमड़ते
अनंत
अथाह
स्नेह सिन्धु से ।
तुम्हारी
सन्दल-देह की सुगंध ही
सबसे अधिक
मादक लगी थी मुझे,
जब तक
किया नहीं था पान
तुम्हारे अन्दर से फूटते
अमिय रसधार का।
किन्तु ,
अब
मैं अपने अंतह में
जीता हूँ
हर पल
तुम्हारा अंकुरण
तुम्हारा विस्तार
और अपनी पूर्णता
एक साथ।
बुधवार, 29 जुलाई 2009
बाँध लो मुझे
नहीं चाहिए छुटकारा।
खींच लो मुझे ,
अपने अंदर,
अतल गहराइयों में,
कि चाह कर भी न उबर सकूँ।
छू लो मुझे
इस तरह
कि पिघल जाए मेरा अस्तित्व
किसी तरल जैसा,
और बूँद बूँद
समाहित हो जाए तुममे ही।
उड़ जाएँ
भाप बनकर,
मेरी सारी दूसरी इच्छाएँ ।
ढँक लो मुझे
इस तरह
कि मेरा हर सत्-असत,
मेरा हर ज्ञान-अज्ञान,
मेरा हर पाप-पुण्य ,
मेरी भौतिकता और आध्यात्मिकता,
सब एकाकार हो जाएँ ।
नही करता
मैं मोक्ष की कामना,
मैं चाहता हूँ
भटकते रहना
अनंतकाल तक
इसी धरती पर
तुम्हारी सुगंध लिए
अपने अंतह में ।
बृहस्पतिवार, 16 जुलाई 2009
एक नज़्म
मेरे हमनफस तेरे साए में, पलती है मेरी हर खुशी।
शब-ए-गम लिए था मैँ चल रहा सूने सफर में अब तलक,
तुम आ मिली सरे राह जो, छायी फिजाँ में रोशनी।
तेरे इश्क की परछाइयाँ, मेरे ज़ख्म-ए -दिल को सूकून दें,
तेरी जुल्फ की नम छाँव में, शामो सहर मेरे शबनमी !
मेरे दिल की सच्ची इबादतें, और रब की मुझ पे इनायतें,
मेरे ख्वाब में थी जो पल रही, मेरे बाजुओं में आ बसी !
तेरे रुख पे उनका जमाल हो, तेरी रूह उनसे निहाल हो,
यह रूप ही तेरा चाहिए , मुझे हर जनम में ऐ जिन्दगी !
बुधवार, 15 जुलाई 2009
तप्त तन मन की धरा को तुम सजल कर दो
तप्त तन मन की धरा को तुम सजल कर दो ।
कंठ को मेरे, सुकोमल निज करों का हार दे दो ।
कर्ण को मेरे, प्रतीक्षित शब्द का उपहार दे दो ।
सुप्त मेरी धमनियों में रक्त का संचार कर दो ,
गर्म अपनी साँस, मेरी साँस में भर दो ।
बेल सी लिपटो, बदन की सख्त शाखों से ।
फैल कर ढँक लो मुझे निज नर्म पाखों से।
मेरे अंतह के मरुस्थल में अक्षय रसधार भर दो ,
मेरे अधरों पर, सरस अपने अधर धर दो ।
मेरी बाहों में बहो जैसे पहाड़ी नद कोई ,
उफनती अति वेग से है पत्थरों को तोड़ती ।
दग्ध तन की भूमि पर अमिय शीतल लेप कर दो,
नर्म जिह्वा की नमी से आज तुम हर रोम भर दो ।
तप्त तन मन की धरा को तुम सजल कर दो !
मंगलवार, 30 जून 2009
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
भाँति भाँति के दरवाजों से, मन में तू पग धरती है
तरह तरह के रूप बदलकर, अंतह में तू जलती है
बढ़ जाती जब तेरी ज्वाला, दग्ध हृदय का आँगन होता
ज्येष्ठ सुता तेरी -निंदा, तब झरती जिह्वा के बादल से !
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
देखूँ जब उन्मत्त नाचते कभी किसी मतवाले को
सात सुरों में गाता देखूँ, हर्ष भरे जब मस्ताने को
कुंठा मेरी, पथ प्रशस्त आने का तेरे कर देती
फुँफकारें तब तेरी उठती हैं मेरे मन कानन से !
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
जब जब देखूँ शान्ति, सुयस, उत्थान किसी के जीवन में
जम जाती तू अडिग शैल सी आकर मन के आँगन में
अहम् हमारा चढ़ जाता है, जाकर तुंग श्रृंग पर तेरे
व्यंग,कटाक्ष, निंदा- अस्त्रों को बरसाता पूरे मन से !
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
मनुज हर्ष ही तो केवल है, स्रोत नहीं तेरे अंकुर का
खग कलरव, नद का कलकल, अनुपम गान भ्रमर का
कभी कभी आधार बने हैं ये भी तेरे आने के
पर-"सुख औ सुन्दरता" देखूँ; अँगडाई लेती तू मन में !
ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
बृहस्पतिवार, 25 जून 2009
तुम सदा ही गीत बनकर
तुम सदा ही प्रीत बनकर हृदय में पलती रहो
हर मरुस्थल राह का बहु पुष्प से भर जाएगा
संग मेरे, तुम सदा यदि बाँह धर चलती रहो
मैं अकेला ही सफर में आज तक चलता रहा
शाप कोई, प्राण में, बड़वाग्नि सा जलता रहा
हर तपन, हर पीर, सारी दग्धता मिट जाएगी
तुम मुझे जो, यूँ सदा ही, आँख में भरती रहो
फलित कोई पुण्य मेरे पूर्व जन्मो का हुआ
धार-शीतल गंग की बन प्राण को तुमने छुआ
स्वर्ग की होगी नहीं मुझको कभी भी कामना
तुम सदा सुख स्रोत बन हिय मध्य जो बहती रहो
शुक्रवार, 19 जून 2009
मेरा पूर्ण तुम हो
मेरे प्राणों का सतत उत्थान हो तुम !
मेरे होने का निरंतर भान देता,
चेतना में स्वाँस भरता, गर्व तुम हो !
प्रिये! मेरा दर्प तुम हो !
मेरे अंतह की सकल तुम कामना हो!
मेरे जीवन की अखंडित साधना हो!
ज्वार सी उठती हृदय के सिन्धु में जो,
भावनाओं का मेरे उन्मान तुम हो!
प्रिये ! मेरी माँग तुम हो!
मेरी साँसों में बसा मधुमास हो तुम !
मेरी आँखों में सजा उल्लास हो तुम !
इन्द्रधनुषी प्रणय की अँगनाइयों में,
विहँसती फिरती सदा; मन-मीत तुम हो !
प्रिये! मेरी प्रीत तुम हो !
मेरी वीणा की मधुर झंकार हो तुम !
मेरे बोलों का सुचिंतन सार हो तुम !
जल तरंगों सा उभरता प्राण से जो,
हृदय में है गूँजता; संगीत तुम हो !
प्रिये! मेरा गीत तुम हो !
मेरे जीवन को मिला; वह सत्य हो तुम !
मेरे अंतह में पला; शिव तत्व हो तुम !
मोहता जो नित नया आयाम लेकर,
आँख में भरता; वो सुन्दर रूप तुम हो !
प्रिये ! मेरा पूर्ण तुम हो !
बुधवार, 27 मई 2009
एक नज़्म
गैहान उनके नूर से आबाद दिखता है
कहर-ए-खिजाँ से सूखकर सहरा हुआ था जो
गुलशन ज़माने बाद वो, शादाब दिखता है
हूँ सामने मैं , अक्स पर उनका दिखाता है
इस आइने का भी अजब अंदाज़ दिखता है
जो है जमाने के लिए बस बूँद पानी की
पलकों तले मोती उन्हें नायाब दिखता है
ये जीस्त गुजरे, मौत आये, बस तेरे दर पे
दिन रात मुझको बस यही इक ख्वाब दिखता है
बादल सुभाग के
बादल सुभाग के
साँवले सलोने से।
कन्ठ से उभरते हैं
सातों सुर एक साथ
झंकृत हो उठता है
अन्तः का तार तार।
अधरों पर खेलती
मोहक-अति चंचला
भरती है राह में
किरणे समुज्ज्वला।
सघन हो बरसते हैं
अमृत के बूँद बूँद
मन का पपीहा
अघाए बिन
पीता है रात दिन.
'तुम'
तुम्हारे रगों में बहते
रक्त को पहचानता हूँ मैं
तुम्हारी साँसों के साथ बहती
अति गहन संवेदनाओं से परिचित हूँ मैं
तुम्हारी उठती गिरती पलकों के साथ
तुम्हारे अन्तः में
उठते गिरते ज्वार भाटे
मेरे प्राणों से एकाकार करते हैं
तुम्हारे मानस में उभरा हर सोच
मेरे मानस में प्रतिस्थापित हो जाता है
मैं सुन लेता हूँ
तुम्हारे मस्तक पर उभर आये
आड़ी तिरछी रेखाओं की बातें
मैं जान लेता हूँ
तुम्हारे मन में उलझते सुलझते
घने बालों की तरह
असंख्य प्रश्न
क्योंकि
मेरी आत्मा में
जन्मो से पल रही आशा हो तुम
मेरे मन की
अनंत अभिलाषा हो तुम
मेरे जीवन की सम्पूर्ण परिभाषा हो तुम
मेरे ही जीव का एक अंश हो तुम
मेरी ही आत्मा का जीवांश हो तुम
तुम बिन -भाग २ (नायिका उवाच)
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
मेरे सारे बोल पिया रूठे बैठे हैं।
राग जिया के सारे साज समेटे सोये
कुम्हलाया है अधर बिना मुस्कान सजाये
नैना सजल निरंतर रात लपेटे रोये
कौन जतन कर, आओ जब तुम, ना जाने दूँ तुमको,
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
हर क्षण गुज़रे बन कंटक कदमो से मेरे
राह तुम्हारी तकती साजन साँझ-सवेरे
बिलखे मेहा, फूल झरे, सब पत्ते टूटे
तुम्हे पुकारे साजन, वाणी मेरी ऐसे
हिया बिलापे ऐसी बिरहन बना गए तुम मुझको
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो !
मन ऐसे मचले की जैसे शिशु कोई हो
मुखडा तेरा ज्यों उसका हो एक खिलौना
बहलूँ मचलूँ जीलूँ जिसे हाथ में लेके
बोलो मेरे प्राण पिया बस तुम ही हो ना!
मुझे बिलखता छोड़ गए क्यों दया न आई तुमको !
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
बदरी तुम्हरे ठाँव न मेरी याद दिलाती?
पवन संदेसे लेके तुम्हरे द्वार न पहुंचा?
ऐसे कैसे सूरज ढलता सांझ द्वार पर !
चाँद न कहता बात मेरी कुछ झाँक झरोखा?
जल थल नभ सब बने उलाँकी दिए न दस्तक तुमको?
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
जैसे मोड़े मुँह बैठा मुस्कान अधर से
बोलो मेरे प्रीतम क्या तुम उन जैसे हो?
सुधि ना ली जो कितने प्रहर उदासी बीते
कहो पिया क्या तुम मुझको भूले बैठे हो?
जो ऐसी हो बात साँस से बंधन तोडूँ फिर तो
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
कल जो आओगे तुम साजन, सम्मुख मेरे
प्राण करेगा अगुवाई तेरी आँगन में
बिखरी जितनी, चुन चुन कर मैं अंग लगूँगी
थामे रखना अपने बाहों के बंधन में
प्रेम रीत में धीरज कैसा ! समझा देना मुझको,
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
बृहस्पतिवार, 23 अप्रैल 2009
क्या गिला करना भला
हो चुका बेजान जो उसमे हरारत खोजना क्या
उम्र भर खून-ए-जिगर से, तू जिन्हें गढ़ता रहा था
उन बुतों का अक्स, जो सोचा किया था, वो बना क्या
खून से काली पड़ीं जो, बाम की उन सीढियों पर
फिर से गर होता ज़बह मज़लूम, छोडो रोकना क्या ?
है अगर दम तो सरे बाज़ार कुछ करतब दिखाओ
बंद कमरे में हमेशा चीखकर यूँ बोलना क्या
सिर्फ छूने में तुम्हारी उँगलियाँ तो काँपती हैं
सिसकियाँ भरने के खातिर, धाव को फिर खोलना क्या
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009
रौद्र रुद्र
शिला प्रगल्भ पुष्ट, व्याघ्र चर्म था बिछा हुआ
अनादि आदि देव थे समाधि में रमे हुए
सती वियोग का अथाह दाह प्राण में लिये
विरक्त, भक्त, सृष्टि के सभी क्रिया कलाप से
हरे त्रिलोक-ताप जो, जले विछोह ताप से
समाधि साध कर रहे विषाद की विवेचना
विदीर्ण जीर्ण प्राण की बनी सुत्राण साधना
ललाट चन्द्र मंद आज छिन्न भिन्न चन्द्रिका
कराल व्याल पीटते कपाल खोह भित्तिका
प्रदाह सिक्त डोलती मिटा तरंग गंग का
गणादि आदि घूमते अतेज, तेज भंग था
उधर विनाश में लगा असुर नरेश "तारका"
अदभ्र शक्ति, तेज, ताप बाहु का अतुल्य था
मिला जो दिव्य-वर बना अमर्त्य, मर्त्य लोक मे
परास्त सुर हुये, दनुज अजेय था त्रिलोक मे
सदन विहीन दीन हीन देवता डरे डरे
निरीह यत्र तत्र क्लांत क्रांत हिय लिए फिरें
सुजान, ऋषिगणों, मनीषियों को घोर त्रास था
मचा हुआ था त्राहि त्राहि भूमि स्वर्ग काँपता
विफल हुए जतन सभी मिला न कुछ उपाय जो
सुरेश संग सुर चले चतुर्मुखार द्वार को
अधम असुर विनाश का गहन रहस्य पूछने
परम पिता विधान-विज्ञ ज्ञान-धाम ब्रह्म से
दुरास के विनाश का विहित रहस्य खोलते
बिरंचि ने कहा, व्यथित सुरेश, देव आदि से
किसी विधान श्रीनिधान शम्भु पाणिग्रह करें
प्रवीर रुद्र-वीर्य-जात दैत्य का दमन करे
परन्तु हैं महेश तो समाधि में रमे हुए
मिटा उमंग, देव सब विचार कर व्यथित हुए
करे समाधि भंग कौन रुद्र की त्रिलोक में
विषाद ग्रस्त त्रस्त देव मुख लगे विलोकने
प्रकट हुए तभी वहाँ, सुरेन्द्र के गुहारि पे
बसंत संग पंचबाण पुष्प चाप कर गहे
विनत सभी विबुध करें मनोज से ये याचना
समय विकट विपत्ति का अपूर्व आज आ पड़ा
असुर विनाश हेतु रुद्र ध्यान भंग जो करो
प्रगाढ़ दाह सिक्त सृष्टि का अतीव दुःख हरो
कहा विहँसि मनोज ने दुरूह यह सुकाज है
वरण समान काल के महेश से दुराव है
परन्तु श्रुति कहे सदा सुजान ज्ञानवान तो
सुकर्म के लिये मिटा दिए सुदेह प्राण को
सुकार्य के लिये मरूँ, नहीं मुझे विक्षोभ हो
हिताय सृष्टि, भंग हो समाधि, कामना करो
मदन चले बसंत, राग, मधु गणादि संग हो
प्रवेग काम का लिये, महेश ध्यान भंग को
प्रभाव में लिया समस्त सृष्टि के निकाय को
विराग,ज्ञान,ध्यान,धर्म,तप,चले अरण्य को
विनत विशाल वृक्ष चूमते उदार वल्लरी
सरित, तडाग भर उमंग सिन्धु ओर बह चलीं
समय बिसार, बन्ध त्याग व्योम, जल, मही चरी
सजीव चर अचर अतीव काम वश हुए सभी
मनुज, दनुज, पिशाच, भूत, व्याल, देव, तापसी
हुए सुजान मार वश विरक्त, सिद्ध, ऋषि, मुनी
सदा विलोकते जगत समस्त व्रह्म छवि लिये
विवेक, धर्म, धैर्य त्याग काम की शरण लिये
वियंग के गुहा मनोज दल सहित पहुँच गये
विलोक ध्यान मग्न भूतनाथ तेज डर गये
फिरे तो लोक लाज थी, रुके तो काल गाल था
मरण अवश्य ही मदन खड़ा हुआ विचारता
प्रकट किया सुरम्य दृश्य कंज मंजु वाटिका
सुभग तडाग, बहु लता, सुमन विविध, हरीतिमा
करें अपूर्व गान, नृत्य काम सिक्त अप्सरा
जतन किये मनोज कोटि किन्तु सब विफल रहा
अचल महेश जो दिखे अहम् जगा अनंग का
अजीत चाप पर चढा अचूक शर निषंग का
प्रखर प्रचंड पुष्प वाण दक्ष वक्ष जा लगा
प्रविष्ट प्राण में हुआ अभेद्य त्राण बेधता
वियंग देह कँपकँपा उठा अनंग वाण से
अनंत व्योम अंतरिक्ष भूमि स्वर्ग कांपते
उठा प्रलय सदृश निनाद नाद दिग्दिगंत से
सिहर उठा कराल काल भाल के तरंग से
चला अदम्य काम मिस्र हो लहू के संग जो
उठा प्रचंड ज्वार अब्धि पे झुका हो चन्द्र जो
अचंड शीश शेष का विकंप, कंप मेदिनी
सकल चराचरे अवाक देखते विकट घडी
फड़क फड़क भुजा उठी, तरंग अंग भर रहा
अनिल सुदीर्घ स्वांस का अनल प्रवाह कर रहा
धधक धधक उठी, प्रचंड तप्त रक्त वाहिनी
महेश के शरीर से बहे तडित प्रदाहिनी
डमक डमक बजा डमरु , त्रिशूल खनखना उठा
अदंक नाद भर गया, दिगंत कंपकपा उठा
लिपट भुजंग रुद्र कंठ जीभ लपलपा उठा
महा कराल काल ज्यों विक्षुब्ध तिलमिला उठा
प्रतप्त सुरनदी वृहद् जटाओं में उबल रही
पतंग सा प्रदीप्त चन्द्र, चन्द्रिका थी जल रही
महेश के त्रिनेत्र पट सवेग फडफडा उठे
रसाल पत्र में छुपे मनोज थरथरा उठे
अखण्ड रोष नीलकंठ का प्रवेग से चला
ज्वलल्ललाट मध्य दीप्त दिव्य चक्षुपट खुला
प्रकट हुयी प्रदाह सिक्त ज्यों प्रभा समुज्ज्वला
असंख्य ज्योति पुंज संग नाचती हो चंचला
पड़ी जो दृष्टि आम्र वृक्ष पर छुपे मनोज पे
हुए तुंरत भस्म कामदेव शिव प्रकोप से
जगे महेश देख देव नाद हर्ष से किये
जगत हिताय कामदेव देह त्याग कर दिये
अमर कथा अजर कथा कथा अजेय पात्र की
प्रकोप, दाह, कामना , महा परोपकार की
कथा विछोह , रोष , अम्बरीश के प्रताप की
हिताय सृष्टि , कामदेव के अपूर्व त्याग की
(इति )
बृहस्पतिवार, 12 मार्च 2009
ऐसा नहीं कि तेरी दुआ में असर नहीं
शब ही हमारी ऐसी कि जिसकी सहर नहीं
जो बिन खिले ही फूल कभी शाख से गिरे
किस्मत यही थी उनकी, खिजा का कहर नहीं
मैं जानता था, राह में दरिया है आग का
बेबस बहुत चला था, मगर बेखबर नहीं
इल्जाम आज देता तुम्हे बेवफाई का
इजहार-ए-इश्क तुमने किया था मगर नहीं
मरता नहीं है कोई किसी के बिना कभी
इतना ही बस कि, दिल में खुशी का बसर नहीं
पहुँचेगा कारवाँ ये कभी तो मुकाम पे
ना खत्म हो कभी, कोई ऐसा सफ़र नहीं
रविवार, 8 मार्च 2009
काली रात
मैं कितना भी चलता
नहीं पहुच पाता
जब तक कि तुम कदम न उठाते।
चाँदनी में नहाना और बात है
पर
उचककर चाँद को छुआ नहीं जाता।
मेरे हौसले के क्षत विक्षत पैरों से
अविरल बहते रक्त को
मेरी आस की कातर नजरें सुखा नहीं पा रही।
ओह कितनी तेज रोशनी आ रही है
आँखे चौधियाने लगी हैं ।
नहीं जानता कि क्या है
जो कालिख सी बिखर रही है
अन्दर भी और बाहर भी,
यम तो नहीं है
साँसें तो चल रहीं हैं
शायद रात होगी
लगता है फिर से सो जाने का वक़्त आ गया।
बुधवार, 4 मार्च 2009
तुम बिन
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
कितनी सांझ सुहानी बीती, वीरानी सी
कितने भोर मनोरम बीते, एकाकी में
कितने तारे नभ पर उतरे बिन आभा के
रजनी बीती जलती साँसों की भाथी में
सुरभि, चन्द्रिका, रिमझिम, लगते अनजाने से मुझको
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
पग आप मुझे उस पुष्प कुटी तक ले जाते
जहाँ सुरभि फूलों में साँसों की भरती थी
झंकृत होती वीणा लेकर हँसी तुम्हारी
शुभ्र ज्योत्सना में आभा मुख की ढलती थी
सहमे वे पल खड़े देखते कातरता से मुझको
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
लांघ देहरी पलकों की वे सकुचाती सी
बाते आतीं, राग सुधा हिय में बरसातीं
लाज रक्तिमा मल देती थी मुख पर तेरे
कम्पित ऊँगली की कोरे जब छू जातीं थीं
तुम बिन मरघट सा लगता सब आ जाओ प्रिय अब तो
उठती है इक हूक हृदय में हर पल चुभता कुछ तो
शनिवार, 28 फरवरी 2009
यदि निश्चय करो तो
रश्मियों का नृत्य, क्रीडा मधुरतम है
अनिल उष्मित है प्रवाहित चहुँ दिशा में
दृष्टि , पथ, उर में भरेगी दिव्य आभा
प्रज्वलित कर एक दीपक तुम चलो तो
इस मरुस्थल पार है उपवन मनोरम
अम्बु शीतल से भरा अनुपम सरोवर
तरु , लता, बहु भांति के सुरभित सुमन हैं
तृप्त होगी प्यास, छाया, सुरभि होगी
पत्र ही बस एक सिर पर धर चलो तो
इस नदी के पार है विस्तृत किनारा
फिर नहीं कोई भंवर, ना तीक्ष्ण धारा
भय नहीं कोई, नहीं शंका कुशंका
जीर्णता मन की मिटेगी शांति होगी
एक बस पतवार संग लेकर चलो तो
ईश के तुम श्रेष्ठतम कृति, हीनता क्यों
पल रही मन में सघन उद्विग्नता क्यों
हो रहा क्यों आज इतना दग्ध मन है
घिर रहा तम क्यों हृदय में गहनतम
क्यों निराशा खोलती अपने परों को
सैकडों मार्तण्ड का है तेज तुममे
वायु से भी है अधिक बल, वेग तुममे
अग्नि से भी तप्त, उर्जा से भरे तुम
यह धरा, आकाश सब होगा तुम्हारा
उठ खड़े हो, प्राण से निश्चय करो तो
मंगलवार, 24 फरवरी 2009
कौन सा सच खोजते हो ?
खींचता है चल रहा वह सृष्टि का रथ अनवरत
हर्ष में हो उल्लसित और वेदना में हो व्यथित
डोर थामे साँस की चलता मनुज का काफिला
यह सत् नही तो क्या भला ?
मोहती मन प्राण को शिशु की मधुर किलकारियाँ
राग भरतीं सरस, मन में प्रिय नयन की बोलियाँ
रागिनी को साँस में भर , हर्ष से उन्मत्त हो
तीर है चंचल सरित के गीत गाता बाँवरा
यह शिव नही तो क्या भला ?
पूर्व नभ में प्रस्फुटित होती मनोरम अरुणिमा
अमराइओं में पत्र से छनती मही पर चन्द्रिका
पुष्प पल्लव पुष्करिणीयां विविध रंगी बहु लता
मेदिनी के वक्ष पर ये लहलहाती हरीतिमा
सुन्दर नहीं तो क्या भला ?
कौन सा सत् , कौन सा शिव और सुन्दर कौन सा
खोजते हो मध्य- वन , गिरि कंदराओं ,गढ़ शिला
क्यों अधिक निष्ठा तुम्हारी मृत्यु में, निर्वाण में
हो नहीं जीवन जगत में और माया, तो कहो
अस्तित्व उनका क्या भला ?
जनमता मरता रहा है जीव सदियों से यहाँ
किंतु शाश्वत सत्य सा जीवन सतत चलता रहा
अवतरित होते रहे हैं देव जीवन केलिए
कोई सिखलाती नहीं गीता , पलायन , विमुखता
बस कर्म ही सबसे बड़ा।
शनिवार, 21 फरवरी 2009
जब लौटकर आया
खो गया था, रूह को कुछ ढूँढते पाया
करवटें लेता रहा दिन रात पलकों में
मेरी नजरों से तुम्हारा भींगता साया
बैठ जातीं आरजूएं डाल कर डेरा
राह खुशियों की यही है कौन भरमाया
बेकहल सब हो गयीं हैं धड़कने, साँसें
ज्वार सी उठतीं कि कोई चाँद उग आया
सैर कर आती पलों में आसमानों की
आस को उड़ना जमाने बाद है आया
बुधवार, 18 फरवरी 2009
जब तुम बरसे
फिर भी पपिहा जल को तरसे
जनम जनम की प्यास बुझी सब
तुम स्वाती बनकर जब बरसे
चाह मिली अभिशाप सदृश
जीवन चलता संत्रास सदृश
ताप मिटा सब दग्ध हृदय का
तुम लिपटे जब चंदन बनके
नील नयन के वितान तले
अब भोर जगे अब रात ढले
अनुराग लिए मुसकान खड़ा
उतरे मधुमास जो तुम बनके
तुम आन मिले हर फूल हँसा
नयनो में मधुरिम आस बसा
खिंच गया हृदय पर इन्द्रधनुष
चहुँ ओर आज तो रंग बरसे
रविवार, 15 फरवरी 2009
वो ही नज़र आने लगे
नीद में भी, जागते भी, ख्वाब से छाने लगे हैं
थी कभी रंजिश बहुत ही , चल दिए थे छोडकर जो
साथ उनके लौटकर साये मेरे आने लगे हैं
बर्फ से जो जम रहे थे मेरे सीने में अभी तक
साँस से उनकी पिघलकर आस लहराने लगे हैं
थे बहुत प्यारे हमेशा साथ जो देते रहे थे
मिल गया जो साथ उनका दर्द बेगाने लगे हैं
लफ्ज आते उन्के सब नज़र -ए -इनायत की तरह हैं
हर्फ़ हर इक जिंदगी के आज नज़राने लगे हैं
भींगता हर एक कोना गुलशन-ए -दिल -जान का है
उन्के होठों की नमी से फूल मुस्काने लगे हैं
जिंदगी तो जा रही थी बहुत बेमानी अभी तक
छू लिया उनकी नज़र ने आज कुछ माने लगे हैं
सोमवार, 9 फरवरी 2009
तुम मेरी परछाई हो
मेरी अँधियारी रातों में , शशि- प्रभा बनकर छायी हो
मन मृग दर-दर भटक रहा, तुम कस्तूरी बनकर आयी हो
तपते हृदय मरुस्थल पर तुम राग सुधा सी बरसायी हो
सूनी नीदों के आँचल में स्वप्न विविध तुम बिखरायी हो
मेरी वीणा के तारों को राग नया तुम सिखलायी हो
चिर सूने उपवन में उर के, पुष्प सदृश तुम खिल आयी हो
ग्रीष्म काल चलता वर्षों से, तुम बसंत लेकर आयी हो
अभिशाप धुल रहा जीवन का, बनकर गंगा तुम आयी हो
जन्मो से बंजर धरती पर पीली सरसों सी छायी हो
दण्डित मेरे जीवन में, फल सत्कर्मो का बन आयी हो
प्यार बहुत तुमसे है मुझको, तुम मेरी ही परछाई हो
शुक्रवार, 6 फरवरी 2009
अभ्युदय
मैंने खुद को जन्मते देखा
तुम्हारे शब्दों की कोख से।
युगों से अभिशप्त,
अनंत नीरव परिधि में भटकती,
अपना ठौर तलाशती
छटपटाती मुक्ति के लिए
अपनी रूह को काया में पलते देखा।
गर्भ के अंधेरे की अभ्यस्त
मेरी नन्ही आँखें, चौंधिया गयी थीं
अचानक फैले प्रकाश से ।
मेरी जननी का वात्सल्य,
मेरे नन्हे शरीर को ढक रहा था
अरुण मयूख सा
और बह रहा था,
धमनियों में रक्त के साथ।
वो बार बार मुझे सीने से चिपटाती,
मेरी मुट्ठियों को खोलकर-
मेरी नन्ही उँगलियों और हथेलियों को
अपने चेहरे से छुआती,
मेरे शरीर को अपनी आंखों में भरती,
मुझमे अपना अक्स निहारती।
उनकी आंखों से झरती खुशियाँ और सपने
मुझे अपनी बाहों में लेकर ,
बार बार झुलाते ,
बार बार दुलारते ।
मैं , अबोध ,
अपरिचित हर शब्द से
अनजान हर भाव से
अचंभित नए विस्तार से
टुकुर टुकुर देखता माँ के चेहरे को,
प्रत्युत्तर दे पाता उनकी सघन भावनाओं का
सिर्फ अपने क्रंदन से ,
सिर्फ अपनी मुस्कान से ।
मंगलवार, 3 फरवरी 2009
मासूम कवितायें
वह मेरी
वक्रता लिए
कलात्मक बातों को
नही समझ पाती है
शब्दों में जड़े
रूपको और अलंकारों को
नही जान पाती है
फिर भी
जब मेरा लिखा पढ़ती है
उसकी आँखें बड़ी बड़ी हो जाती हैं
माथे पर गर्व
आंखों में प्रेम
चेहरे पर मुस्कराहट फैल जाती है
और मुझे
सबसे बड़ी दाद मिल जाती है।
२।
शाम,
जब न दिन होता है न रात
न तो पूरा अँधेरा होता है
और न ही पूरा उजाला
क्यों इतनी प्रिय लगती है ?
क्या इसलिए कि हम
कुछ देख पाने का सुख पाते हैं
और कुछ न देख पाने का
कौतूहल मन में बसाते हैं
३।
कल
इसी गाड़ी पर बैठना
बहुत बुरा लगा था
और आज बहुत अच्छा
कल
यह तुमसे दूर जा रही थी
आज
तुम्हारी ओर आ रही है
रविवार, 1 फरवरी 2009
तीन छोटी कवितायें
बहुत चाह है
इन दिनों
कि मैं
हवा के झोंके सा छूकर
तुम्हारी पलकों में
इन्द्रधनुषी सपने बिखेर दूँ
मेरी हथेलियों पर
अपना भार रखकर
तुम सितारों को छुओ
और मैं
तुम्हारी उड़ान का सुख
अपनी आंखों में भरूँ
२।
जब कभी
यह यहसास होता है
कि मेरी साँसों में
घुलने वाली हवाएँ
तुम्हे छू कर आयी हैं
मैं स्वयं को जमीन से
छः इंच ऊपर पाता हूँ
मेरे पैरों और जमीन के बीच
एक नर्म सी,
गुदगुदी पर्त बिछ जाती है
जी चाहता है
बस उसपर दौड़ता रहूँ
उम्र भर।
३।
हमारी हर मुलाकात के अंत में
कहा गया
तुम्हारा आखिरी शब्द
बर्फ की चादर सा
बाकी सारे शब्दों को ढँक लेता है
तुम्हारा चेहरा
मुझे उस चादर में
डूबता उतराता सा दीखता है
मैं प्रतीक्षा करता रहता हूँ
बर्फ के पुनः पिघलने का.
बृहस्पतिवार, 29 जनवरी 2009
पुकार
पथ भरा हो तिमिर से या रश्मियों से
हो भरा वह कंटकों से या सुमन से
जो तुम्हारे द्वार तक ले जाए मुझको
बस यही वरदान दो कि मैं सदा उस पंथ पर ही पग धरूँ
बस गान तेरा ही करुँ
तीब्र लहरें हों भले या शांत धारा
दीखता हो दूर कितना ही किनारा
आ रही हो रश्मि तेरी जिस दिशा से
बस यही वर दो उधर ही मैं सदा नाव अपनी ले चलूँ
बस गान तेरा ही करुँ
नीद में होऊं भले या चेतना में
हर्ष में होऊं भले या वेदना में
एक पल भी भूल पाऊं ना तुम्हे
बस यही कर दो सदा ही मैं तुम्हारा हर घड़ी सुमिरन करुँ
बस गान तेरा ही करुँ
खींचती हैं ओर अपनी वासनायें
दंभ भी फुंफकारता है फन उठाये
बिद्ध हूँ मैं पाश में माया जगत के
बन्ध सारे काट दो कि मैं सदा बस ध्यान तुम पर ही धरूँ
बस गान तेरा ही करुँ
सोमवार, 26 जनवरी 2009
कैसे प्रणय का राग गाऊँ
भूख से आक्रांत बच्चे की कहीं से
बिलखती , हिय चीरती
आवाज आती है ।
अश्रु भर कर लोचनों में,
क्षीण जर्जर गात ले
फिर कहीं तो माँ कोई
पानी पकाती है ।
उस करुण चीत्कार को,
उन आँसुओं की धार को मैं भूलकर
बोल अपने गीत के कैसे सजाऊँ?
प्रिय कहो कैसे प्रणय का राग गाऊँ?
हड्डियों तक को कँपाती सर्द रातों में,
बैठ कोई व्योम के नीचे
लिपटकर चीथड़े में
काँपता,
सिर को धँसाकर बीच घुटनों के,
रात आँखों में लिए वह जूझता
बर्फ से ठंडे थपेडों से,
टकटकी बाँधे हुए पूर्वी क्षितिज पर
कर रहा मनुहार रवि की
प्रथम किरणों का,
काँपती उस देह को मैं भूलकर
किस तरह सितार में झंकार लाऊँ?
प्रिय कहो कैसे प्रणय का राग गाऊँ?
जोंक सी चिपटी हुयी निज जिंदगी को,
खींचता है चल रहा
चार पहियों पर कोई .
देखता गलते हुए अपनी उंगलियाँ व्याधि से,
बिलबिलाता दर्द से तन के,
जलन ढोता क्षुधा का।
चुनौती देता सकल पुरुषार्थ को,
अस्पृश्य
वह वीभत्सता कटाक्ष करती
मनुज के सौंदर्य पर ।
सड़ती हुयी उस जिंदगी के चित्र को
मानस पटल से ,खुरचकर
कैसे तुम्हारे रूप का मैं गान गाऊं ?
प्रिय कहो कैसे प्रणय का राग गाऊँ ?
काटकर मानव गला नृशंसता से ,
मद भरा, मत-अंध मानव
रक्त से स्नान कर
करता हुआ अभिषेक
दानव का अहम् के,
मनुजता के वक्ष पर रख पैर
तांडव कर रहा
भर रहा हुँकार प्रतिपल।
चीरती जो गर्म लावे की तरह
कर अनसुनी उसको
कहो मैं किस तरह बंशी बजाऊँ ?
प्रिय कहो कैसे प्रणय का राग गाऊँ ?
गा नही सकता प्रणय का गान मैं।
भर रहा मन आर्त नादो से
करुण चीत्कार से
बेधता है हृदय को वह दानवी हुँकार।
खो नही मैं पा रहा इन नर्म बालों में,
ढल नही है पा रहा
सौन्दय अनुपम
बोल बनकर मेरे गीतों में।
है नही उठ पा रहा संगीत कोई
आज इस चंचल हँसी से।
बुझ रहा यह दीप मैं कैसे जलाऊं ?
प्रिय कहो कैसे प्रणय का राग गाऊँ ?
जा रहा मैं
पास उन कातर स्वरों के,
लौटकर कब आ सकूँगा
यह नही मै जानता
पर सुनो,
जब देखना भूखा कोई
भरपेट खाकर मुस्कराए,
सोचना मैं लिख रहा हूँ गीत
तुम्हारे लिए।
जब देखना कि दीन कोई सो सके
गात ढककर , नीद भरकर,
समझना मैं कस रहा
वीणा के तारों को।
और जब मिलते हुए तुम देखना सौहार्द्र से
दो व्यक्तियों को भिन्न मत के ,
समझना संगीत मेरा बज रहा ।
और जब तुम देख पाओगी कहीं मुझको
मरहम लगाते दूसरों के घाव पर,
उस समय जब मुस्कराओगी,
प्रणय का राग फूटेगा स्वतः
मेरे अन्तह में कहीं ,
घुलकर हवाओं में तुम्हारे पास आएगा ।
जल उठेगा दीप फिर
खिल उठेगा पुष्प सा
राग तब वह एक नया आयाम पायेगा ।
बृहस्पतिवार, 22 जनवरी 2009
स्वप्न
मन स्वप्न कोई बुन रहा था,
यूँ लगा
मैं चाँदनी में बैठ तुमको सुन रहा था।
कूल था कालिन्दि का वह ,
और जिसके पत्र से थी छन रही
शुभ्र उज्जवल चन्द्रिका,
कदम्ब का वह वृक्ष
दिखता अति सुनहरा था।
झर रहे थे पुष्प बनकर
शब्द अधरों से तुम्हारे,
रोपता मन
अंजली में हर सुमन
बाहें पसारे,
और देता अर्घ्य नयनो को ,
उमड़ता नेह जिनमे
दीखता ,
सागर सा गहरा था ।
छू रहा था पवन चंचल
उष्ण करता
मुख मेरा,
बह रहा था बाहु में भर
मद भरा उच्छ्वास तेरा,
और छूता पुनः जाकर
केश घुंघराले तुम्हारे,
बिखरते उड़ते लटों से
स्निग्ध मुखमंडल घिरा था।
दूर तक फैले हुए
रव-हीनता को भंग करती ,
अंक में अपने सरित
भर झिलमिलाते मोतियों से
रश्मि पुंजों को,
उल्लसित हो नाद करती
गान मंगल गा रही थी ।
चिर प्रतीक्षारत खड़ा
वह वृद्ध तरु,
अति नेह से
था पत्र वर्षा कर रहा ,
ज्यों दे रहा पुष्पांजली
अपने मिलन पर।
देखता विस्तृत नयन से
मन में कौतूहल लिए,
क्षणों के नन्हे करों की
नर्म ऊँगली थामकर,
उस कूल पर कालिन्दि के
आ समय ठहरा था ।
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
पुकार
तुम अभी तक कर रहे विश्राम ?
उठो ! चलो ! पकड़ो पतवार !
जल्दी बाँधो पाल ,
हमको जाना है उस पार।
पूर्व क्षितिज में कितना ऊपर
चढ़ आया है सूर्य,
गवां दिए कितने ही पल निद्रा में
हमको जाना कितनी दूर।
आह ! तुम्हारी कितनी जर्जर नाव !
और लहरों का वेग प्रचंड,
उठ रहे पल पल भीषण ज्वार
भर रहे हैं मन में आतंक.
हाय! भरी कितने छिद्रों से
तेरी टूटी नाव ,
और
किनारा भी दिखता अति दूर।
चल रहीं कितनी प्रबल हवाएं ,
नाव डुबाने को आतुर।
भाग रहा द्रुत गति से दिनकर ,
पूर्ण करने को अपनी राह।
बची शेष हैं कुछ घडियां ,
भर रहा सघन मन में अवसाद।
लगता यह दिन भी होगा बेकार ,
न कर पायेंगे हम पार,
अभी तम छाएगा चहुँ ओर
फंसा देगी हमको मँझधार.
आह!
लगा दी कितनी देर
समय से किया नही प्रस्थान .
अभी तो राह हुई है मध्य
क्षीण होता प्रतिपल दिनमान।
बढ़ रहा तिमिर इस ओर,
पसारे अपनी बाँह,
झांक रहा है
क्षितिज ओट से
मुस्काता अवसान ।
सोमवार, 19 जनवरी 2009
पुकार
जो तुमने मुझको त्याग दिया
जीवन भर के व्यथा विरह का
क्यों मुझको अभिशाप दिया
अंध कूप में बैठा , अंधी
राह टटोला करता हूँ
तेरी ही माया के हाथों
सिसक सिसक कर मरता हूँ
तिमिर भरे राहों पर भटका
डगमग पग मैं धरता हूँ
मेरे जीवन के रश्मि पुंज का
क्यों तुमने है क्षार किया
कितने विविध छलावे तुमने
जगह जगह बिखराए हैं
बाँध मुझे दे धंसा रसातल
कितनी विविध विधाएं है
भूल तुम्हारा पथ मैं भटकूँ
सम्मोहन सब छाये हैं
विस्मृत तुमको कर दूँ , तुमने
क्यों ऐसा संधान किया
व्यथित हृदय रहता है हर पल
पीड़ा भरती जाती है
अकुलाहट सी उठती उर में
हूंक उभर कर आती है
दो पत्र कहीं दे छाँव तपन से
दृष्टि खोज थक जाती है
विकल वेदना का ऐसा क्यों
तुमने पारावार दिया
कब हाथ बढ़ा कर छू लोगे
कब ताप हृदय का जायेगा
कब पूर्ण प्रायश्चित होगी
कब ज्योति पुंज आएगा
काट तिमिर के घेरे को कब
राह तुम्हारी दिखलायेगा
बैठ प्रतीक्षा करता, पथ में
तन मन सारा वार दिया
आहट- अजन्ता शर्मा
दो ओस बिन्दु इक पत्ते पर क्या इंगित करने आए हैं
सम्मुख न होकर भी जो बन दृश्य दृगों पर छाये हैं
क्या जाने इन शब्दों में छुपकर मेरे लिए वो आये हैं
मन पुलक पुलक उठता जैसे वे देख मुझे मुस्काए हैं
तन सिहर सिहर जाता जैसे वे मुझको कंठ लगाये हैं
मधुमास उतरता अलकों में, पलकों में मद भर आये हैं
निरख निरख सकुचाती दर्पण बिम्ब उन्ही के छाये हैं
पद चाप उभरता दूर कहीं आने को कदम बढाये हैं
मन द्वार प्रबल दस्तक देतीं , छू आयीं उन्हें हवायें हैं
कंगन औ पायल के खन खन, सभी मुझे भरमाये हैं
चूड़ी बज, देती भ्रम आहट की द्वार मेरे वो आये हैं
ये झिलमिल करते तारक- दल किरनो की झांकी लाये है
है बिखर रही जो रश्मि पुंज लगता वे दीप जलाये हैं
है गूंज रही स्वर लहरी गुंजित होती सकल दिशाए हैं
छू रहा हृदय को सन्दल सा ज्यों गीत उन्होंने गाये हैं
मन आतुर होता है प्रतिपल ये कैसी सघन दशाये हैं
आ बैठे मेरे पास पकड़ कर हाथ यही बस चाहे हैं
अधर मौन हो रहे लजाते नैन सुधा बरसाए हैं
मैं चक्षु झरोखे से तकती सब जगह वही तो छाये हैं
(अजन्ता जी की कवितायें हिन्दी की अग्रणी पत्रिकाओं (इन्द्र दर्शन , हिन्दी चेतना , गर्भनाल आदि ) में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ और पेंटिंग्स ई-मैगजीन - अनुभूति, साहित्य कुञ्ज , हिन्दी नेस्ट , वेब दुनिया , काव्यालय , ई बज्म , रेडियो सबरंग पर भी उपलब्ध हैं। मैं उनका बहुत आभारी हूँ की उन्होंने अपनी नई रचना मुझे अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने की अनुमति दी । यह कविता मुझे बेहद पसंद है और इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने का मेरा प्रयोजन उनकी लेखनी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना मात्र है । उनकी कविताओं और पेंटिंग्स के लिए उनके ब्लॉग - http://www.ajantasharma.blogspot.com/ पर जाया जा सकता है.)
शुक्रवार, 16 जनवरी 2009
चेतना
है नदी का आज कितना व्यग्र पानी।
मिस्र होकर बह चला जो अश्रु जल,
क्षत विक्षत ले गात रोती है जवानी॥
लौह तन है जीर्ण प्रतिपल हो रहा,
क्षीण होता हर घड़ी संचित अतुल बल।
वक्ष पर आघात गुरुतर लग रहे ,
छोड़ते नित गहन घावों की निशानी ॥
दीप्त रहता था सदा जो सूर्य के -,
आलोक सा, मुख मलिन पड़ता जा रहा।
रक्त रंजित गात प्रतिपल तड़पता,
बोलता हर घाव दारुण व्यथा वानी ॥
दीर्घ साँसें खींचती , चित्कारती ,
मांगती अस्तित्व अपना ही मनुज से ।
धुंध से जो भर रही सारी दिशाए ,
ढूंढती उनमे कहीं बिसरी कहानी ॥
चाहती श्रृंगार साँसों का पुनः ,
मांगती आधार अपनी चेतना का ।
व्याधि बढ़ता गरल सा है बेंधता ,
मांगती उपचार ले आंखों में पानी ॥
बृहस्पतिवार, 15 जनवरी 2009
फर्क
"तुममें" और "हममें"
यूँ तो हैं दोनों
एक ही मिट्टी से बने,
पर
तुम्हारे बदन पर
कभी पसीने नही आते
और हम हैं कि
सदा पसीने में ही नहाते
तुम्हे परेशान करते हैं
व्यापार के घाटे
हमें बेधती हैं
भूख से
बिलबिलाती आंतें
तुम्हे पीड़ा देता है
तुम्हारी कार का
खराब पड़ा
वातानुकूलन यन्त्र
हमें सताती है
हमारे पैरों में उभरते
छालों की जलन
हमारे पसीने से उगे अनाज
तुम मजे से खाते हो
और हम
अपने ही उगाये दानो को
तरस जाते हैं
तुम कितनी आसानी से
निगल लेते हो
दूसरों के
रक्त से सनी रोटी
हमें संकोच होता है
भर पेट खाने में
अपने ही पसीने से
सनी रोटी
तुम अपने कुत्तों को भी
गर्म कपडे पहनाते हो
और हमारे बच्चे
घुटनों को
पेट में धंसाकर सो जाते हैं
बहुत फर्क है
तुममे और हममें
यह फर्क बस
जीवन के साथ चलता है
पर अंततः
एक दिन करवट बदलता है
दोनों
एक ही श्मशान पर जलाये जाते हैं
दोनों का ही शरीर,
मुट्ठी भर राख में बदलता है
मंगलवार, 13 जनवरी 2009
पुकार
अगम, अनंत उंचाईयों से
अदृश्य छलिया सा
सुनाते हो अपनी बंशी की तान
भरते हो मन में
चाह एक अनजान
और जब उन्मत्त हो
तुम्हारी ओर बढ़ते हैं पाँव
भेज देते हो अनेकों घातक व्याल
उनका दंश भर देता है गरल रग रग में
छा जाता है चेतना पर उन्माद
भूल जाता हूँ पथ
फिरता हूँ वासनाओं के द्वार द्वार
क्यों करते हो मुझसे खेल बार बार
क्षण भर को दिखा आलोक
फिर कर देते हो गहन अंधकार
भेजते हो अपने प्रहरी
देकर सुनहरे पाश
बाँध कर मुझको वे कर देते हैं सुप्त
नही देखने देते
मुझको अपने ही घाव
पिलाकर मुझे मेरा ही रक्त
कर देते हैं मदहोश
भूल जाता हूँ आलोक
करता हूँ निशा से अभिसार
क्यों करते हो मुझसे खेल बार बार
शनिवार, 10 जनवरी 2009
कब तक
कायरों सा चोट खाते और बिलखते जाएँगे
राजपथ पर रंगरलियों सा समां काफ़ी नही
शत्रु के सीने में कब, बन डर उतरते जाएँगे
अब गलीचों के बिना चलने की आदत डाल लो
कल ज़मीं की ताप से छाले उभरते जाएँगे
ज़ख़्म पर जो लग रहे फिर ज़ख़्म, अब तरजीह दो
सब्र के साए में पक नासूर बनते जाएँगे
अहमियत बस खेल सारा जब तलक है चल रहा
अंत में राजा और प्यादा साथ चलते जाएँगे
फ़र्क क्या पड़ता है ग़र साँसों की गिनती घट गयी
ज़िंदगी गर ना रही लफ़्ज़ों में जीते जाएँगे
नन्ही परी
एक नन्ही सी परी सी
या कि जूही की कली सी
.............तोतली भाषा में कुछ -कुछ बोलती
.............मुस्कान निर्मल हृदय में मधु घोलती
वह किसी मिसरी डली सी
एक नन्ही सी परी सी
लघु पाँव चंचल चंचला सी
सरित बहती निर्मला सी
............. दौड़ती आँगन में यूँ जो, तितलियाँ
............. उन्मुक्त उड़ती भर रही किलकारियां
मन लुभाती वल्लरी सी
एक नन्ही सी परी सी
अति-सुकोमल कमल मुख पर
भंगिमाएं विविधतर धर
...............लोइयां गढ़ती सी, घर में डोलती
...............अठखेलियों के स्वर्ण सम्पुट खोलती
विहँसती सूरजमुखी सी
एक नन्ही सी परी सी
शुक्रवार, 9 जनवरी 2009
हा ! तुम्हे कितना रुलाया
प्रस्फुटित नव कोपलों के
मुस्कराते अधर पट पर
व्यथा-संचित,दाह -पूरित,
मौन का भीषण गरल धर
हर्ष गुंजित क्यारियां
नीरव सदा को छोड़ आया
हा ! तुम्हे कितना रुलाया
उतरते मन व्योम पर शशि,
चन्द्रिका को बाहु भर कर
नृत्य को उद्यत हुआ ज्यों
प्रणय का नव राग भर कर
व्योम,शशि औ चन्द्रिका को
राहु बन कर लील आया
हा ! तुम्हे कितना रुलाया
नव- यौवना सी चाह के
मासूम स्वर्णिम स्वप्न पर
ले जलन बड़वानल सदृश
विच्छोह बरसा,अनल बन
गुरु- वेदना अभिसिक्त , कातर,
सजल लोचन छोड़ आया
हा ! तुम्हे कितना रुलाया
चल रहा अभिशाप मेरा
संग, प्रतिपल काल बन
स्पर्श मेरा, दंश विषधर -
सा दिया पीड़ा सघन
जिस प्राण प्रिय से प्रेम को
पोषित उमंगो से किया
नवजात शिशु के कंठ को ही
निज करों से घोट आया
हा ! तुम्हे कितना रुलाया
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
आलिंगन
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय,
जिस पल मुझको कन्ठ लगाते
मिल साथ रक्त के, रग रग में,
स्पर्श तुम्हारा गतिमय होता
छू लेता उच्छ्वास कर्ण पट,
राग -बिद्ध उर सुध बुध खोता
विरह - वेदना संचित, पल में,
धुल जाती मृदु चितवन से
प्रेम प्रतीक्षा-रत जन्मो से ,
निरख-निरख मुख, चक्षु अघाते
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय,
जिस पल मुझको कन्ठ लगाते
जल प्रेम सुधा का नयनो में,
माणिक सा झिलमिल, भर जाता
मिल संग हृदय का स्पंदन-
रव , रोम रोम को मदमाता
बाँहों- साँसों का अवगुन्थन-
अस्तित्व न रहता अलग अलग
मन, प्राण, गात के संगम पर
शशि, तारक-दल बलिहारी जाते
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय,
जिस पल मुझको कन्ठ लगाते
शनिवार, 3 जनवरी 2009
स्पर्श
उन पलों को,
या कि
जीवन का मधुरतम स्वप्न था।
रुप धर
जब शब्द का
तुमने छुआ था,
मेरे अंतह के मृदुल यहसास को।
एक दरिया
जन्म से अवरुद्ध था-
जो पल रहा,
गहरे कहीं मन-प्राण अन्दर
फूट निकला,
बहने लगा मै धार संग,
अनुभूति – नव
छूने लगी
हर रोम पुलकित हो उठा।
मुख झुका था व्योम से,
था दर्प फैला-
चाँदनी सा,
प्रस्फुटित होती हजारों रश्मियाँ,
मन सरोवर में खिले
अगणित कमल- दल,
भान देते
जल उठे ज्यों
सैकड़ों ही दीप-दल।
संग मेरे हो लिए थे
मूर्त बन
यूँ स्वप्न सारे,
ज्यों हुये हों
फलित मेरे
जन्म भर के पुण्य सब,
लेता हिलोरें
तीब्र अति उर प्रान्त में
था सिन्धु-सुख,
उद्यत हुआ स्पर्श को
होते उदित शशि-भाग्य को।
उतर आया था
धरा पर
स्वर्ग का ऐश्वर्य सब
करने लगे थे गान,
वे समवेत स्वर में
हर्ष, सुख
उन्माद अतिशय उल्लसित,
ज्यों बंदना थे कर रहे सब
हृदय सिंहासन विराजित
नव उदित
नृप-प्रेम की.
बृहस्पतिवार, 1 जनवरी 2009
नव वर्ष
सपने नवरंग लिए
आशा के दीप लिए
जीवन संगीत लिए
आया नववर्ष, चढ़
किरनो की पालकी
आओ प्रिये संग हो
नाचें मलंग हो
मन के मृदंग को
एक नया थाप दें
गाएँ उन्मत्त हो
एक नयी रागिनी
आया नव वर्ष, चढ़
किरनो की पालकी
बन्ध सारे खोल दें
चाहत को बोल दें
हाथों में हाथ ले
बढ़ चलें साथ में
गीत लिखें प्रेम के
मस्तक पर काल की
आया नव वर्ष, चढ़
किरनो की पालकी
तुम्हारा होना
मन को गुदगुदाता है
सर्दियों की गुनगुनी धूप की तरह
चूमता है मेरे मस्तक को
गर्मियों के भोर की ठंडी हवाओं की तरह
भिगोता है मेरे बदन को
सावन की मादक फुहारों की तरह
लिपट जाता है मुझसे
बार बार, एक मासूम शिशु की तरह
मैं देखता हूँ
शरद के पूरे चाँद को
उतरते हुए हृदय- आकाश पर ।
सोमवार, 29 दिसम्बर 2008
विमुखता
और मैं जंगल में जाकर दूर तक
तोड़ लाता मेहंदी के झाड़।
उनकी हथेलियों का चटख रंग
बिखरता पूरे दिन मेरे होठों पर
मुस्कराहट बनकर।
बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं समंदर में उतरकर गहरे
इकठ्ठा कर लाता मोतियों वाले सीप।
उनके गले की श्वेत आभा
झिलमिलाती पूरे दिन मेरी आंखों में
चमक बनकर।
बहुत चाह थी कि वे माँगते मुझसे
और मैं भोर में बगीचे से
चुन लाता बेला के फूलों को ।
उनके बालों की मादक सुगंध
बसती पूरे दिन मेरी साँसों में
गुदगुदी बनकर।
उन्होंने म