बुधवार, 27 मई 2009

बादल सुभाग के

घिर आये हैं मेरे
बादल सुभाग के
साँवले सलोने से।

कन्ठ से उभरते हैं
सातों सुर एक साथ
झंकृत हो उठता है
अन्तः का तार तार।

अधरों पर खेलती
मोहक-अति चंचला
भरती है राह में
किरणे समुज्ज्वला।

सघन हो बरसते हैं
अमृत के बूँद बूँद
मन का पपीहा
अघाए बिन
पीता है रात दिन.

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! वाह ! वाह ! अतिसुन्दर भावाभिव्यक्ति......

    आनंद आ गया...aabhaar...

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  2. संतृप्त प्रांजल मन में प्रकीर्णित शीतलता सहज ही अभिव्यक्त हुयी है ! ऊपर वाली गजल से ज्यादा सुन्दर लगी यह कविता |

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...!!

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