शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

जब लौटकर आया

जब तुम्हारे वज़्म से मैं लौटकर आया
खो गया था, रूह को कुछ ढूँढते पाया

करवटें लेता रहा दिन रात पलकों में
मेरी नजरों से तुम्हारा भींगता साया

बैठ जातीं आरजूएं डाल कर डेरा
राह खुशियों की यही है कौन भरमाया

बेकहल सब हो गयीं हैं धड़कने, साँसें
ज्वार सी उठतीं कि कोई चाँद उग आया

सैर कर आती पलों में आसमानों की
आस को उड़ना जमाने बाद है आया

10 टिप्‍पणियां:

  1. बैठ जातीं आरजूएं डाल कर डेरा
    राह खुशियों की यही है कौन भरमाया

    बेकहल सब हो गयीं हैं धड़कने, साँसें
    ज्वार सी उठतीं कि कोई चाँद उग आया
    वाह बहुत सुन्दर।

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  2. सैर कर आती पलों में आसमानों की
    आस को उड़ना जमाने बाद है आया

    वाह प्रताप जी
    बहुत ही सुंदर कल्पना, सुंदर उड़ान है आपकी

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  3. करवटें लेता रहा दिन रात पलकों में
    मेरी नजरों से तुम्हारा भीगता साया

    बहुत खूब प्रताप जी...बहुत अच्छा लिखा है आपने...


    नीरज

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  4. बहुत सुंदर ग़ज़ल. क्या खूब लिखते हैं आप भी. आभार.

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  5. sair kar aati paloN mei aasmano ki
    aas ko urna zmaane baad hai aaya

    bahut khoob....
    classic ideas...
    bahut mn-bhaavan rachna...
    ---MUFLIS---

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  6. प्रेम की ऐसी गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति पर कुछ शब्दों की क्या प्रतिक्रया दी जाय यह मेरी समझ में बिलकुल भी नही आता ! प्रतिक्रिया के नाम प्रतिक्रिया दे देना कुछ ज्यादा कठिन नही है लेकिन यह एक प्रकार से उस गूढ़ एकांत अनुभूति की गरिमा की मूढ़ अवहेलना लगती है , खासकर कविता के परिपेक्ष्य में !

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  7. करवटें लेता रहा दिन रात पलकों में
    मेरी नजरों से तुम्हारा भींगता साया

    बढ़िया कहा आपने सुंदर अभिव्यक्ति

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  8. Absolutely lovely. Cannot find right words for its appreciation. Simplicity of expressions are magnetic and leaves mark on the reader instantly. Exceptional work Pratapji.Carry on.

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