शुक्रवार, 19 जून 2009

मेरा पूर्ण तुम हो

मेरे मस्तक पर उभरता मान हो तुम!
मेरे प्राणों का सतत उत्थान हो तुम !
मेरे होने का निरंतर भान देता,
चेतना में स्वाँस भरता, गर्व तुम हो !
प्रिये! मेरा दर्प तुम हो !

मेरे अंतह की सकल तुम कामना हो!
मेरे जीवन की अखंडित साधना हो!
ज्वार सी उठती हृदय के सिन्धु में जो,
भावनाओं का मेरे उन्मान तुम हो!
प्रिये ! मेरी माँग तुम हो!

मेरी साँसों में बसा मधुमास हो तुम !
मेरी आँखों में सजा उल्लास हो तुम !
इन्द्रधनुषी प्रणय की अँगनाइयों में,
विहँसती फिरती सदा; मन-मीत तुम हो !
प्रिये! मेरी प्रीत तुम हो !

मेरी वीणा की मधुर झंकार हो तुम !
मेरे बोलों का सुचिंतन सार हो तुम !
जल तरंगों सा उभरता प्राण से जो,
हृदय में है गूँजता; संगीत तुम हो !
प्रिये! मेरा गीत तुम हो !

मेरे जीवन को मिला; वह सत्य हो तुम !
मेरे अंतह में पला; शिव तत्व हो तुम !
मोहता जो नित नया आयाम लेकर,
आँख में भरता; वो सुन्दर रूप तुम हो !
प्रिये ! मेरा पूर्ण तुम हो !

4 टिप्‍पणियां:

  1. ek bahut hi sundar bhaawa ..........pyaar ek maan samaan abhimaana kyaa baat kahi hai aapane ............aapki kawita ka koee jabaaw nahi.......bahut hi komal our maasoom abhiwyakti

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  2. प्यार की सुन्दर अभिव्यक्ति............. कोमल, सात्विक रचना है हर चाँद लाजवाब लिखा है......... samarpan का shudh bhaav लिए

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  3. प्रेम की यह पवित्र सौम्य अभिव्यक्ति मंत्र मुग्ध कर गयी.....

    बहुत ही सुन्दर प्रवाहमयी प्रेम गीत रची आपने...साधुवाद..

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  4. बहुत सुन्दर व बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

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