गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

प्रतीक्षा

तुम्हारी प्रतीक्षा में
रोज अपने घर को बुहारता हूँ
सजाता हूँ पल्लव और पुष्पों से
रास्ते में पड़े काटों को चुनता हूँ
पिरोता हूँ बहुरंगी फूलों को माला में
वीणा के तारों को कसता हूँ
सजाता हूँ अपने गीतों के बोलों को
बार बार देहरी तक देख आता हूँ
पर तुम नही आते

सूरज चढ़ जाता है आसमान में ऊपर
पुष्प कुम्भलाने लगते हैं
रास्ते में सूखे पत्ते और काटें भरने लगते हैं
वीणा के तार ढीले पड़ने लगते हैं
पर तुम नहीं आते

सूरज छिपने लगता है दूर पहाड़ियों के पीछे
रास्ते पर धूल का गुबार उठने लगता है
फूल मुरझा जाते हैं
वीणा के तार शिथिल हो जाते हैं
मेरी आँखें डबडबा जाती हैं
पर तुम नही आते

रात की स्याही से मेरा आँगन भर जाता है
आसमान में तारे टिमटिमाते हैं
दूर कहीं पद-चाप सुनता हूँ
सोचता हूँ तुम राह में हो
और फिर तैयारी करने लगता हूँ
नए दिन के प्रतीक्षा की.

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