गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

चाह

प्रिये ! जब तुम आओगे
चिर-प्रतीक्षारत अपने झूले को
बाधूंगा आम की शाखों पर
और पेंग बढाकर
हम बादलों को छू आयेंगे

प्रिये ! जब तुम आओगे
चिर-उपेक्षित अपनी वीणा के
ढीले तारों को कसूँगा
और तुम्हारे बोलों पर
स्वर लहरी गूंज उठेगी
मेरे आँगन में

प्रिये ! जब तुम आओगे
चिर-लंबित अपनी नाव पर
डालूँगा सुनहरे पाल
और चंचल धारा पर नाचती
सूरज की किरणों के साथ
घूम आयेंगे हम परियों के देश तक.

प्रिये ! जब तुम आओगे
चिर- खंडित अपनी प्रेम की मूर्ति को
जोडूंगा अपनी आंखों की तरलता से
और हम खुशियों के बगीचे से
भावों के बहुरंगी पुष्प चुनकर
उम्र भर अर्पित करेंगे.

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