गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

क्या गिला करना भला

क्या गिला करना भला, देना दुहाई, कोसना क्या
हो चुका बेजान जो उसमे हरारत खोजना क्या

उम्र भर खून-ए-जिगर से, तू जिन्हें गढ़ता रहा था
उन बुतों का अक्स, जो सोचा किया था, वो बना क्या

है अगर दम तो सरे बाज़ार कुछ करतब दिखाओ
बंद कमरे में हमेशा चीखकर यूँ बोलना क्या

सिर्फ छूने में तुम्हारी उँगलियाँ तो काँपती हैं
सिसकियाँ भरने के खातिर, धाव को फिर खोलना क्या

2 टिप्‍पणियां:

  1. खून से काली पड़ीं जो, बाम की उन सीढियों पर
    फिर से गर होता ज़बह मज़लूम, छोडो रोकना क्या

    बहुत ही प्रभावी ग़ज़ल है पूरी की पूरी..............हर शेर लाजवाब

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  2. "दर्द बढ कर फुगा न बन जाए......"...अवसाद का शनैः शनैः क्षोभ में बदलना दिखाती कविता....वैसे यह शैली बहुत ज्यादा समझ नहीं पाता मै !

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