सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

मेरा गुलसितां था नया नया

थी कली अभी तो चटक रही, अभी फूल था बस अधखिला
क्यूँ ख़बर खिज़ाओं को मिल गई, मेरा गुलसितां था नया नया

जो न मंज़िलें हों नसीब में, मुझको न कोई मलाल है
बस ख़त्म हो न कभी मेरे कदमो तले है जो रास्ता

उस शाम पाकड़ के तले तुमने गले जो लगाया था
इन सर्दियों में हरारतें वही ओढ़ के मैं तो चल रहा

हर बार देते हैं ज़ख्म वे, हर बार ही हम सोचते
जो गई वो बात बिसार दे, जो भी हो गया वह हो गया

न ये आख़िरी है पड़ाव ही, न ही आख़िरी ये मुकाम है
उस पार जाकर रूह बस पहनेगी इक कपड़ा नया

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें