बुधवार, 29 जुलाई 2009

बाँध लो मुझे

बाँध लो मुझे,
नहीं चाहिए छुटकारा।
खींच लो मुझे ,
अपने अंदर,
अतल गहराइयों में,
कि चाह कर भी न उबर सकूँ।

छू लो मुझे
इस तरह
कि पिघल जाए मेरा अस्तित्व
किसी तरल जैसा,
और बूँद बूँद
समाहित हो जाए तुममे ही।
उड़ जाएँ
भाप बनकर,
मेरी सारी दूसरी इच्छाएँ ।

ढँक लो मुझे
इस तरह
कि मेरा हर सत्-असत,
मेरा हर ज्ञान-अज्ञान,
मेरा हर पाप-पुण्य ,
मेरी भौतिकता और आध्यात्मिकता,
सब एकाकार हो जाएँ ।

नही करता
मैं मोक्ष की कामना,
मैं चाहता हूँ
भटकते रहना
अनंतकाल तक
इसी धरती पर
तुम्हारी सुगंध लिए
अपने अंतह में ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. नही करता
    मैं मोक्ष की कामना,
    मैं चाहता हूँ
    भटकते रहना
    अनंतकाल तक
    इसी धरती पर
    तुम्हारी सुगंध लिए
    अपने अंतह में ।
    बहुत सुन्दर भावमय अभिव्यक्ति के लिये बहुत बहुत बधाई

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  2. नही करता
    मैं मोक्ष की कामना,
    मैं चाहता हूँ
    भटकते रहना
    अनंतकाल तक
    इसी धरती पर

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  3. नही करता
    मैं मोक्ष की कामना,
    मैं चाहता हूँ
    भटकते रहना
    अनंतकाल तक
    इसी धरती पर
    तुम्हारी सुगंध लिए
    अपने अंतह में ।

    jaha bhaawanaye etani sashakt ho to khubsoorati rachana me aa hi jayegi ....ji karata hai ise bar bar padhu ......pyar hi pyar hai is rachana me......atisundar

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  4. छू लो मुझे
    इस तरह
    कि पिघल जाए मेरा अस्तित्व
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति -- समर्पण का खूबसूरत एहसास

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  5. लगता है आप भी रेम में डूब गयी है......... प्रेम में डोब कर लिखी लाजवाब अनुभूति है आपकी

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