शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

यदि निश्चय करो तो

इस तिमिर के पार उज्ज्वल रवि-सदन है
रश्मियों का नृत्य, क्रीडा मधुरतम है
अनिल उष्मित है प्रवाहित चहुँ दिशा में
दृष्टि , पथ, उर में भरेगी दिव्य आभा

प्रज्वलित कर एक दीपक तुम चलो तो

इस मरुस्थल पार है उपवन मनोरम
अम्बु शीतल से भरा अनुपम सरोवर
तरु , लता, बहु भांति के सुरभित सुमन हैं
तृप्त होगी प्यास, छाया, सुरभि होगी

पत्र ही बस एक सिर पर धर चलो तो

इस नदी के पार है विस्तृत किनारा
फिर नहीं कोई भंवर, ना तीक्ष्ण धारा
भय नहीं कोई, नहीं शंका कुशंका
जीर्णता मन की मिटेगी शांति होगी

एक बस पतवार संग लेकर चलो तो

ईश के तुम श्रेष्ठतम कृति, हीनता क्यों
पल रही मन में सघन उद्विग्नता क्यों
हो रहा क्यों आज इतना दग्ध मन है
घिर रहा तम क्यों हृदय में गहनतम

क्यों निराशा खोलती अपने परों को

सैकडों मार्तण्ड का है तेज तुममे
वायु से भी है अधिक बल, वेग तुममे
अग्नि से भी तप्त, उर्जा से भरे तुम
यह धरा, आकाश सब होगा तुम्हारा

उठ खड़े हो, प्राण से निश्चय करो तो

15 टिप्‍पणियां:

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  2. उत्कृष्ट, प्रेरणादायी कविता. आभार..

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  3. प्रताप जी, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .आपकी रचनाये सुन्दर शब्दों के साथ सुन्दर भावों को लिए हुए हैं .
    यह धरा, आकाश सब होगा तुम्हारा
    उठ खड़े हो, प्राण से निश्चय करो तो .
    बधाई

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  4. इस नदी के पार है विस्तृत किनारा
    फिर नहीं कोई भंवर, ना तीक्ष्ण धारा
    भय नहीं कोई, नहीं शंका कुशंका
    जीर्णता मन की मिटेगी शांति होगी
    ........
    kafi badhiyaa

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  5. सैकडों मार्तण्ड का है तेज तुममे
    वायु से भी है अधिक बल, वेग तुममे
    अग्नि से भी तप्त, उर्जा से भरे तुम
    यह धरा, आकाश सब होगा तुम्हारा

    उठ खड़े हो, प्राण से निश्चय करो तो


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति-बार बार पढी

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  6. इस मरुस्थल पार है उपवन मनोरम
    अम्बु शीतल से भरा अनुपम सरोवर
    तरु , लता, बहु भांति के सुरभित सुमन हैं
    तृप्त होगी प्यास, छाया, सुरभि होगी
    वाह बहुत सुन्दर।

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  7. कमाल है भाई. आज पहली बार आप को पढ़ा है ( ये मेरी अपनी कमी है ) लेकिन अब हर बार आप की पोस्ट मेरी कमाई होगी ( Comment हो न हो, ये भी मेरी कमी है ) !!

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  8. "ईश के तुम श्रेष्ठतम कृति, हीनता क्यों
    पल रही मन में सघन उद्विग्नता क्यों
    हो रहा क्यों आज इतना दग्ध मन है
    घिर रहा तम क्यों हृदय में गहनतम

    क्यों निराशा खोलती अपने परों को

    सैकडों मार्तण्ड का है तेज तुममे
    वायु से भी है अधिक बल, वेग तुममे
    अग्नि से भी तप्त, उर्जा से भरे तुम
    यह धरा, आकाश सब होगा तुम्हारा"
    इधर कई दिनों से कुछ ऐसा ही पढ़ने को खोज रहा था ! बहुत सुदर ! कोटि कोटि धन्यवाद !

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  9. अद्भुत..... आपकी लेखनी को नमन करता हूं... साधुवाद..

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  10. Poem creates and spreads very positive vibes among readers. Beautifully written with good flow. Selection of words are also very impacting. Very encouraging poem.
    I appreciate the positivity of your thoughts Pratapji. Good Work.

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  11. बेहतरीन प्रस्तुति सदैव आपके ब्लॉग आकर ताजगी महसूस होती है आध्यात्म को सुन्दर शब्दों से सहज अभिव्यक्त किया है आपने

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  12. प्रज्वलित कर एक दीपक तुम चलो तो

    इस मरुस्थल पार है उपवन मनोरम
    अम्बु शीतल से भरा अनुपम सरोवर
    तरु , लता, बहु भांति के सुरभित सुमन हैं
    तृप्त होगी प्यास, छाया, सुरभि होगी....

    वाह..!! हर बार की tarah सुन्दर अभिव्यक्ति..!!

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  13. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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