बुधवार, 23 सितंबर 2009

नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए

नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए
चल रहे हम फिर भी लेकिन लब सिले हुए

आईने को देख रोया जार जार मैं
मुद्दतें थीं हो चुकीं ख़ुद से मिले हुए

आस उड़ने की लिए, बस मैं खड़ा रहा
आसमाँ तो था खुला, "पर" थे सिले हुए

कबसे आई है नहीं तेरी हँसी यहाँ
एक अर्सा हो गया अब गुल खिले हुए

ये हमारी बेवफाई का सिला नहीं
चल गयी जो चाल किस्मत, फासले हुए

खुशबुएँ हाथो से उनके अब भी आ रहीं
क़त्ले गुल की साजिशों में थे मिले हुए

1 टिप्पणी:

  1. "आस उड़ने की लिए, बस मैं खड़ा रहा
    आसमाँ तो था खुला, "पर" थे सिले हुए"

    अजीब बात है ......अज्ञेय की पंक्तिया याद आयी .......
    " मै वह धनु हू जिसकी प्रत्यंचा टूट गयी है ,
    स्ख़लित हुआ है बाण यदपि ध्वनि दिगदिगंत में फैल गयी है..."

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