गुरुवार, 25 जून 2009

तुम सदा ही गीत बनकर

तुम सदा ही गीत बनकर शब्द में ढलती रहो
तुम सदा ही प्रीत बनकर हृदय में पलती रहो
हर मरुस्थल राह का बहु पुष्प से भर जाएगा
संग मेरे, तुम सदा यदि बाँह धर चलती रहो

मैं अकेला ही सफर में आज तक चलता रहा
शाप कोई, प्राण में, बड़वाग्नि सा जलता रहा
हर तपन, हर पीर, सारी दग्धता मिट जाएगी
तुम मुझे जो, यूँ सदा ही, आँख में भरती रहो

फलित कोई पुण्य मेरे पूर्व जन्मो का हुआ
धार-शीतल गंग की बन प्राण को तुमने छुआ
स्वर्ग की होगी नहीं मुझको कभी भी कामना
तुम सदा सुख स्रोत बन हिय मध्य जो बहती रहो

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रेमभिव्यक्ति है शुभकामनायें

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  2. सुन्दर भावनाओ से भरी रचना
    बहुत अच्छा लगा

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  3. भाव और समर्पण से भरी आप की कविता
    दिल को भा गयी,
    आप की कविता तो अब मेरे ज़ुबान पर छा गयी,
    बहुत बहुत धन्यवाद आपको.

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  4. बहुत सुन्दर कविता और उससे भी सुन्दर मनोभाव हैं।
    घुघुती बासूती

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  5. सुन्दर और समर्पण का भाव लिए अच्छी रचना है.............. मधुर एहसास से भरी

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