बुधवार, 19 अगस्त 2009

उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है

गम नहीं जो राह में मेरी, गुलों का घर नहीं है ।
बस्तियाँ काँटों की हैं, और हाथ में नश्तर नहीं है ।

है अजब ही खेल ऐ मौला ! तुम्हारा इस जहां में,
डूबता कोई, किसी को बूँद तक मयस्सर नहीं है ।

ज़िन्दगी! तू क्यों भला फिर से उन्हें दुहरा रही है
पास मेरे जिन सवालों का कोई उत्तर नहीं है ।

इश्क औ' मरजाद दोनों ही, सनम! कैसे निभेगी ?
है हथेली में तेरे पर नाम माथे पर नहीं है

हो सकेगी गुफ्तगू भी अब भला कैसे हमारी
अब वहाँ, उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. गम नहीं कि राह में मेरी, गुलों का घर नहीं है ।
    बस्तियाँ काँटों की हैं, पर हाथ में नश्तर नहीं है ।

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति,बधाई ।

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  2. हो सकेगी गुफ्तगू भी अब भला कैसे हमारी
    अब वहाँ, उस झील के तट पे, कोई पत्थर नहीं है

    vaah ... lajawaab ग़ज़ल है, umda sher

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