सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

तुम मेरी परछाई हो

जीवन की सूनी राहों में , गीत मधुर तुम बिखरायी हो
मेरी अँधियारी रातों में , शशि- प्रभा बनकर छायी हो
मन मृग दर-दर भटक रहा, तुम कस्तूरी बनकर आयी हो
तपते हृदय मरुस्थल पर तुम राग सुधा सी बरसायी हो

सूनी नीदों के आँचल में स्वप्न विविध तुम बिखरायी हो
मेरी वीणा के तारों को राग नया तुम सिखलायी हो
चिर सूने उपवन में उर के, पुष्प सदृश तुम खिल आयी हो
ग्रीष्म काल चलता वर्षों से, तुम बसंत लेकर आयी हो

अभिशाप धुल रहा जीवन का, बनकर गंगा तुम आयी हो
जन्मो से बंजर धरती पर पीली सरसों सी छायी हो
दण्डित मेरे जीवन में, फल सत्कर्मो का बन आयी हो
प्यार बहुत तुमसे है मुझको, तुम मेरी ही परछाई हो

13 टिप्‍पणियां:

  1. "तुम मेरी ही परछाई हो" बहुत सुंदर. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  2. यूँ लगता है .....
    जीवन में बहार आई हो
    शब्दों की हरियाली है
    भावों के रंग हैं.........और बहुत सुन्दर हैं

    उत्तर देंहटाएं
  3. ग्रीष्म काल चलता वर्षों से तुम बसंत लेकर आयी हो --बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीवन की सूनी राहों पर,
    देती परछाँई साथ हमेशा।
    मन-वीणा के तारों पर,
    झनकाती नव-राग हमेशा।।
    प्यार बहुत है- लेकिन,
    क्या यह इकतरफा इजहार नही?
    मैंने तो कर दिया समर्पण,
    क्या तुमको स्वीकार नही ??

    उत्तर देंहटाएं
  5. "प्यार बहुत है तुमसे मुझको तुम मेरी ही परछायी हो!"
    इस पंक्ति से पूरी कविता ही कुछ और हो गयी ,अर्थ विस्तार हो गया है !
    सुन्दर है !

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्या जलवा बिखेरा है आपने ...एक एक लाइन प्यार भरी कहानी कहने को लालायित है । जारी रखिए धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. Lots of purity and affection, beautiful meaning reflects in each line. Your poems are actually reader’s delight. Keep it up. Congrats on creating another heart-felt lovely poem Pratapji.

    उत्तर देंहटाएं
  8. bahut khoob pratap ji ,bahut sundar .

    kahani ke font theek kar diye hain kripaya avlokan karen,shayad theek ho gaya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  9. चिर सूने उपवन में उर के, पुष्प सदृश तुम खिल आयी हो
    ग्रीष्म काल चलता वर्षों से, तुम बसंत लेकर आयी हो

    यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आई ..भावपूर्ण और सुंदर एहसास लिए हैं आपकी यह रचना

    उत्तर देंहटाएं
  10. bahut khubsurat kavita...

    'ग्रीष्म काल चलता वर्षों से, तुम बसंत लेकर आयी हो'

    Waah!! bhaavon ki prastuti bhaa gayi.

    उत्तर देंहटाएं
  11. प्रकृति ने हमें केवल प्रेम के लिए यहाँ भेजा है. इसे किसी दायरे में नहीं बाधा जा सकता है. बस इसे सही तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है. ***वैलेंटाइन डे की आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयाँ***
    -----------------------------------
    'युवा' ब्लॉग पर आपकी अनुपम अभिव्यक्तियों का स्वागत है !!!

    उत्तर देंहटाएं