गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

तीन गीत

१.
कोई मधुर गीत मिल जाता
मैं भी दो पल गा लेता
मनमीत मुझे भी मिल जाता
प्यार मैं दो पल पा लेता

उम्र को दोपहरी में
लू उठती है यौवन की
झुलसाती है विरह अग्नि में
प्यास बढ़ा देती मन की

प्रेम की छाया मिल जाती
दो पल मैं भी सुस्ता लेता
कोई मधुर गीत मिल जाता
मैं भी दो पल गा लेता

याद किसी की आ जाती
पलकों पर सपने छा जाते
झोंका बहार का मिल जाता
सूखे पतझड़ फ़िर मुसकाते

प्रेम का कोई बादल यदि
जीवन रस बरसा देता
कोई मधुर गीत मिल जाता
मैं भी दो पल गा लेता

हर रात अँधेरी लगती है
तारा भी कोई पास नही
टूटे बोल लुढ़कते से
उन्माद नही, उत्साह नही

टूट गए इन साजों में
कोई जीवन जो ला देता
कोई मधुर गीत मिल जाता
मैं भी दो पल गा लेता

२.

कुछ भूल गया , कुछ याद रहा

स्वप्नों का सुंदर दीप जला
जीवन को मधुर संगीत मिला
प्यार का वैभव साथ रहा
कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

कुछ मेरे भी अपने थे
हर गीत प्रीत से बने थे
हर पल में उन्माद रहा
कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

दीप जला हाथों जिनके
प्रेम प्रकाश मिला जिनसे
क्यों मुझसे वे छूट गए
मुझको इसका ही विषाद

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

नाव से सागर तय करना
कितना मुश्किल हो जाता है
मानव अपने ही बंधन को
आप समझ ना पाता है

सुख दुःख के राहों होकर
जीवन तय कर जाता है
कभी पराये अपने लगते
अपना भी पराया हो जाता है

मुझको भी मिला कोई अपना
मेरे भी कोई साथ रहा
कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

३.
पास मेरे तुम नही,
पर मैं तुम्हारे पास हूँ

बाग़ में खिलती कलियाँ
नुपुर की तेरी हैं मणियाँ
कोयलों का चहचहाना
होठों पे तेरे गीत आना

अन्तह में अपने झोंके पवन के
भरकर तेरा उच्छ्वास लाते
कपोल खिलते यूँ कली के
ज्यों होठ तेरे कसमसाते

गालों की तेरी सुर्ख लाली
वातावरण में छा गयी है
संसार की खुशियाँ सभी ही
पास मेरे आ गयी हैं

फुहार झरते यूँ घटा से
कि भींगे केश को झटका दिया हो
झिलमिलाती ओस की बूँदें यूँ लगती
अपना आँचल तुने फैला दिया हो

धरती पर फैली चाँदनी
तेरे मुखड़े की चमक है
आसमां के हैं सितारे
या तेरी बिंदिया की दमक है

कौंधी जो बिजली यूँ लगा
आज फिर तुम खिलखिलाई
सरसराहट पत्तों की लगती
चुपके से तुम हो पास आई

सब कुछ है तेरा पास मेरे
फिर भी मन उदास है
पास मेरे तुम नही
पर मैं तुम्हारे पास हूँ


1 टिप्पणी:

  1. सादर नमन ,
    आपके कोमल ह्रदय को ,आपके कलम को और आपके सभी रचनाओं को मेरा शत-२ नमन ,शब्दों मे प्रशंसशा करना , कम से कम मेरे लिए उचित नहीं होगा ,और न ही मे आपके साथ न्याय कर सकूंगा. आपने जिस ढंग से जिस सुन्दरता से अपने मनोभाव को कविता के रूप मे प्रस्तुत किया उसके लिए आप वास्तव मे धन्यवाद के पात्र है , मे माता सरस्वती से प्रार्थना करता हु की आप निरंतर इसी प्रकार लिखते रहे और माँ आपको और आपकी लेखनी को और शक्ति प्रदान करे ...ताकि आप अपने सुन्दर भावनाओं को इसी प्रकार हम जैसे लोगो तक पंहुचा सके .....आपका शुभेच्छ ....इश्वर

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