रविवार, 15 फ़रवरी 2009

वो ही नज़र आने लगे

आज तो हर अक्स में वो ही नज़र आने लगे हैं
नीद में भी, जागते भी, ख्वाब से छाने लगे हैं

थी कभी रंजिश बहुत ही, चल दिए थे छोडकर जो
साथ उनके लौटकर साये मेरे आने लगे हैं

बर्फ से जो जम रहे थे मेरे सीने में अभी तक
साँस से उनकी पिघलकर आस लहराने लगे हैं

थे बहुत प्यारे हमेशा साथ जो देते रहे थे
मिल गया जो साथ उनका दर्द बेगाने लगे हैं

लफ्ज आते उन्के सब नज़रे-इनायत की तरह हैं
हर्फ़ हर इक जिंदगी के आज नज़राने लगे हैं

भींगता हर एक कोना गुलशने-दिल-जान का है
उन्के होठों की नमी से फूल मुस्काने लगे हैं

जिंदगी तो जा रही थी बहुत बेमानी अभी तक
छू लिया उनकी नज़र ने आज कुछ माने लगे हैं

11 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदगी तो जा रही थी बहुत बेमानी अभी तक
    छू लिया उनकी नज़र ने आज कुछ माने लगे हैं
    .......bahut komal,arth bhare bhaw hain,nihsandeh bahut achhi rachna

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  2. बड़ी प्यारी लगी आपकी ग़ज़ल. आभार.

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  3. थे बहुत प्यारे हमेशा साथ जो देते रहे थे
    मिल गया जो साथ उनका दर्द बेगाने लगे हैं

    बहुत खूबसूरत शेर है आपका और ग़ज़ल......लाजवाब.

    नीरज

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  4. जिंदगी तो जा रही थी बहुत बेमानी अभी तक
    छू लिया उनकी नज़र ने आज कुछ माने लगे हैं

    बहुत बढ़िया खूबसूरत लिखा है आपने

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  5. प्रताप जी
    अच्छी ग़ज़ल है सब शेर खूबसूरत हैं

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