शनिवार, 3 जनवरी 2009

स्पर्श

मैंने जिया था चेतना में
उन पलों को,
या कि
जीवन का मधुरतम स्वप्न था।
रुप धर
जब शब्द का
तुमने छुआ था,
मेरे अंतह के मृदुल यहसास को।

एक दरिया
जन्म से अवरुद्ध था-
जो पल रहा,
गहरे कहीं मन-प्राण अन्दर
फूट निकला,
बहने लगा मै धार संग,
अनुभूति – नव
छूने लगी
हर रोम पुलकित हो उठा।

मुख झुका था व्योम से,
था दर्प फैला-
चाँदनी सा,
प्रस्फुटित होती हजारों रश्मियाँ,
मन सरोवर में खिले
अगणित कमल- दल,
भान देते
जल उठे ज्यों
सैकड़ों ही दीप-दल।

संग मेरे हो लिए थे
मूर्त बन
यूँ स्वप्न सारे,
ज्यों हुये हों
फलित मेरे
जन्म भर के पुण्य सब,
लेता हिलोरें
तीव्र अति उर प्रान्त में
था सिन्धु-सुख,
उद्यत हुआ स्पर्श को
होते उदित शशि-भाग्य को।

उतर आया था
धरा पर
स्वर्ग का ऐश्वर्य सब
करने लगे थे गान,
वे समवेत स्वर में
हर्ष, सुख
उन्माद अतिशय उल्लसित,
ज्यों बंदना थे कर रहे सब
हृदय सिंहासन विराजित
नव उदित
नृप-प्रेम की.

1 टिप्पणी:

  1. संग मेरे हो लिए थे
    मूर्त बन
    यूँ स्वप्न सारे,
    ज्यों हुये हों
    फलित मेरे
    जन्म भर के पुण्य सब
    Its so beautiful pratap ji.These Words are magical. The flow of this poem is like flow of silent river.
    One of my favourite.

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