शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

रौद्र रुद्र

प्रशस्त शस्त शैल मध्य चिर विविक्त कन्दरा
शिला प्रगल्भ पुष्ट, व्याघ्र चर्म था बिछा हुआ
अनादि आदि देव थे समाधि में रमे हुए
सती वियोग का अथाह दाह प्राण में लिये

विरक्त, भक्त, सृष्टि के सभी क्रिया कलाप से
हरे त्रिलोक-ताप जो, जले विछोह ताप से
समाधि साध कर रहे विषाद की विवेचना
विदीर्ण जीर्ण प्राण की बनी सुत्राण साधना

ललाट चन्द्र मंद आज छिन्न भिन्न चन्द्रिका
कराल व्याल पीटते कपाल खोह भित्तिका
प्रदाह सिक्त डोलती मिटा तरंग गंग का
गणादि आदि घूमते अतेज, तेज भंग था

उधर विनाश में लगा असुर नरेश "तारका"
अदम्य शक्ति, तेज, ताप बाहु का अतुल्य था
मिला जो दिव्य-वर बना अमर्त्य, मर्त्य लोक मे
परास्त सुर हुये, दनुज अजेय था त्रिलोक मे

सदन विहीन दीन हीन देवता डरे डरे
निरीह यत्र तत्र क्लांत क्रांत हिय लिए फिरें
सुजान, ऋषिगणों, मनीषियों को घोर त्रास था
मचा हुआ था त्राहि त्राहि भूमि स्वर्ग काँपता

विफल हुए जतन सभी मिला न कुछ उपाय जो
सुरेश संग सुर चले चतुर्मुखार द्वार को
अधम असुर विनाश का गहन रहस्य पूछने
परम पिता विधान-विज्ञ ज्ञान-धाम ब्रह्म से

दुरास के विनाश का विहित रहस्य खोलते
बिरंचि ने कहा, व्यथित सुरेश, देव आदि से
किसी विधान श्रीनिधान शम्भु पाणिग्रह करें
प्रवीर रुद्र-वीर्य-जात दैत्य का दमन करे

परन्तु हैं महेश तो समाधि में रमे हुए
मिटा उमंग, देव सब विचार कर व्यथित हुए
करे समाधि भंग कौन रुद्र की त्रिलोक में
विषाद ग्रस्त त्रस्त देव मुख लगे विलोकने

प्रकट हुए तभी वहाँ, सुरेन्द्र के गुहारि पे
बसंत संग पंचबाण पुष्प चाप कर गहे
विनत सभी विबुध करें मनोज से ये याचना
समय विकट विपत्ति का अपूर्व आज आ पड़ा

असुर विनाश हेतु रुद्र ध्यान भंग जो करो
प्रगाढ़ दाह सिक्त सृष्टि का अतीव दुःख हरो
कहा विहँसि मनोज ने दुरूह यह सुकाज है
वरण समान काल के महेश से दुराव है

परन्तु श्रुति कहे सदा सुजान ज्ञानवान तो
सुकर्म के लिये मिटा दिए सुदेह प्राण को
सुकार्य के लिये मरूँ, नहीं मुझे विक्षोभ हो
हिताय सृष्टि, भंग हो समाधि, कामना करो

मदन चले बसंत, राग, मधु गणादि संग हो
प्रवेग काम का लिये, महेश ध्यान भंग को
प्रभाव में लिया समस्त सृष्टि के निकाय को
विराग,ज्ञान,ध्यान,धर्म,तप,चले अरण्य को

विनत विशाल वृक्ष चूमते उदार वल्लरी
सरित, तडाग भर उमंग सिन्धु ओर बह चलीं
समय बिसार, बन्ध त्याग व्योम, जल, मही चरी
सजीव चर अचर अतीव काम वश हुए सभी

मनुज, दनुज, पिशाच, भूत, व्याल, देव, तापसी
हुए सुजान मार वश विरक्त, सिद्ध, ऋषि, मुनी
सदा विलोकते जगत समस्त व्रह्म छवि लिये
विवेक, धर्म, धैर्य त्याग काम की शरण लिये

वियंग के गुहा मनोज दल सहित पहुँच गये
विलोक ध्यान मग्न भूतनाथ तेज डर गये
फिरे तो लोक लाज थी, रुके तो काल गाल था
मरण अवश्य ही मदन खड़ा हुआ विचारता

प्रकट किया सुरम्य दृश्य कंज मंजु वाटिका
सुभग तडाग, बहु लता, सुमन विविध, हरीतिमा
करें अपूर्व गान, नृत्य काम सिक्त अप्सरा
जतन किये मनोज कोटि किन्तु सब विफल रहा

अचल महेश जो दिखे अहम् जगा अनंग का
अजीत चाप पर चढा अचूक शर निषंग का
प्रखर प्रचंड पुष्प वाण दक्ष वक्ष जा लगा
प्रविष्ट प्राण में हुआ अभेद्य त्राण बेधता

वियंग देह कँपकँपा उठा अनंग वाण से
अनंत व्योम अंतरिक्ष भूमि स्वर्ग कांपते
उठा प्रलय सदृश निनाद नाद दिग्दिगंत से
सिहर उठा कराल काल भाल के तरंग से

चला अदम्य काम मिस्र हो लहू के संग जो
उठा प्रचंड ज्वार अब्धि पे झुका हो चन्द्र जो
अचंड शीश शेष का विकंप, कंप मेदिनी
सकल चराचरे अवाक देखते विकट घडी

फड़क फड़क भुजा उठी, तरंग अंग भर रहा
अनिल सुदीर्घ स्वांस का अनल प्रवाह कर रहा
धधक धधक उठी, प्रचंड तप्त रक्त वाहिनी
महेश के शरीर से बहे तडित प्रदाहिनी

डमक डमक बजा डमरु , त्रिशूल खनखना उठा
प्रचण्ड नाद भर गया, दिगंत कंपकपा उठा
लिपट भुजंग रुद्र कंठ जीभ लपलपा उठा
महा कराल काल ज्यों विक्षुब्ध तिलमिला उठा

प्रतप्त सुरनदी वृहद् जटाओं में उबल रही
पतंग सा प्रदीप्त चन्द्र, चन्द्रिका थी जल रही
महेश के त्रिनेत्र पट सवेग फडफडा उठे
रसाल पत्र में छुपे मनोज थरथरा उठे

अखण्ड रोष नीलकंठ का प्रवेग से चला
ज्वलल्ललाट मध्य दीप्त दिव्य चक्षुपट खुला
प्रकट हुयी प्रदाह सिक्त ज्यों प्रभा समुज्ज्वला
असंख्य ज्योति पुंज संग नाचती हो चंचला

पड़ी जो दृष्टि आम्र वृक्ष पर छुपे मनोज पे
हुए तुंरत भस्म कामदेव शिव प्रकोप से
जगे महेश देख देव नाद हर्ष से किये
जगत हिताय कामदेव देह त्याग कर दिये

अमर कथा अजर कथा कथा अजेय पात्र की
प्रकोप, दाह, कामना , महा परोपकार की
कथा विछोह , रोष , अम्बरीश के प्रताप की
हिताय सृष्टि , कामदेव के अपूर्व त्याग की
(इति )

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रशंशा को कोई शब्द नहीं मेरे पास.........क्या कहूँ???

    अद्वितीय !!!

    मैंने इसे अपने पास सहेज लिया है...

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  2. प्रताप नारायण जी
    बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना है. जिस प्राजलता से आपने रचना को सजाया है प्रसंशनीय है.
    - विजय

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  3. आपकी लेखनी कि उत्कृष्टता की मैं प्रशंसक हूँ,कायल हूँ...

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  4. सुन्दर...भावपूर्ण रचना..............
    मनमोहक

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  5. भाषा का सौन्दर्य अनुपम है । लय, प्रांजलता व ओज गुण मिलकर “रुद्र का रौद्र रूप” कुशलता पूर्वक अभिव्यक्त कर रहें हैं । संस्कृतनिष्ठ शब्दावली में भी अभीष्ट प्रभाव सम्प्रेषण के लिये व्यंजनगुच्छों (consonant clusters) से युक्त शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया गया है । जैसे प्रश्स्त,शस्त ,प्रगल्भ ,पुष्ट , प्रदाह , सुत्राण ...इत्यादि । लगभग १३३ शब्दों में (प्रारम्भ से “..भूमि स्वर्ग कांपता” तक )१० शब्द ही ऐसे है जिनमें लघु “इ” शब्दान्त (word boundary) में प्रयुक्त हुयी हैं । यह दोनों चीजें भाषा में एक खिचाव उत्पन्न कर रहीं हैं जिससे ओज समृद्ध हो रहा है ।
    दूसरी महत्वपूर्ण व रूचिकर बात प्रयुक्त छन्द के विषय में देखी जा सकती है । यदि मैं गलत नहीं हूं तो इन पंक्तियों में “अर्धनाराच ” छन्द का प्रयोग किया गया है । आधुनिक काल की रचनाओं में इसका प्रयोग तो शायद ही कहीं मिले । आदिकाल में “पृथ्वीराज रासो” में यह छन्द प्रयुक्त हुआ है । उदाहरण देखिये -

    “मराल बाल आसनं, अलित्त्त छाय सासनं ।
    सोहंति आसु तुंबरं , सुराग राज धुंमरं ।
    कयंद केस मुक्‍करे ,उरग्‍ग बास विठ्ठरे ।
    कपोल रेख गातयो, उवंत इन्दु प्रातयो ।“

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