एक आहट
नीदों का उचटना
एक चेहरा
कुछ शब्द
देर तक छटपटाहट
गुरुवार, 25 दिसंबर 2008
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तुम आई,
मेरी सुबह अरुणिम
और रातें रुपहली हो गईं
हवाएँ सुगन्धित हो उठीं
साँझ इन्द्रधनुषी हो गई
अच्छा हुआ जो तुम आई
अन्यथा
कितना कुछ
आँखों की पुतलियों पर
मात्र एक कल्पित-बिम्ब सा रह जाता
जीवन कितना खूबसूरत होता है
मैं कभी नहीं जान पाता.
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