गुरुवार, 27 मई 2010

सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गया

सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गया
अच्छा हुआ वो आँख मेरी नम जो कर गया
मौजें बहा के ले गईं कदमों के सब निशां
बादल बरस के फिर से हरा घाव कर गया

रिश्ता मिरा सराब से गहरा बहुत रहा    (सराब= मरीचिका)
वो भी चला था साथ मेरे मैं जिधर गया

मैंने तो कोई आइना तोड़ा नहीं कभी
फिर भी जाने अक़्स मेरा क्यूँ बिखर गया
आदत ही तीरगी की मुझे ऐसी पड़ गई     (तीरगी = अँधेरा)
थोड़ी सी रौशनी से मेरा दिल सिहर गया

बस मोम का लिबास था ज़ख्मों के ज़िस्म पर
हमदर्द इक नज़र जो पड़ी तन उघर गया

6 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने तो कोई आइना तोड़ा नहीं कभी
    जाने न फिर भी अक़्स मेरा क्यूँ बिखर गया

    खूबसरत प्रस्तुति प्रताप जी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. बस मोम का लिबास था ज़ख्मों के बदन पर
    हमदर्द इक नज़र से सारा तन उघर गया

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल...

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  3. रिश्ता मिरा सराब से गहरा रहा बहुत
    वो भी चला था साथ मेरे मैं जिधर गया

    लाजवाब कहन है

    मज़ा आ गया

    दिली दाद कबूल करें

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  4. प्रताप जी अपने ब्लॉग पर फालोवर का लिंक लगा दें जिससे आपके ब्लॉग को फालो किया जा सके
    पाठक के लिए आपके ब्लॉग को नियमित पढ़ने के लिए ये इक आसान रास्ता है

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  5. आपकी (जंगल की हवा शहरों में भी चलती है ) पोस्ट चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. आदरणीया संगीता जी, मेरी पोस्ट को चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर लेने के लिए बहुत बहुत आभार.
    सादर
    प्रताप

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