बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

बंशी की टेर उठे


बंशी की टेर उठे नदिया के तीर
मन में जगाए
अनजानी सी पीर
 
बंशी की टेर उठे नदिया के तीर

नावों के पाल फटे
हहराती लहर उठे
आज हैं हवाएँ क्यों
इतनी अधीर
 
बंशी की टेर उठे नदिया के तीर

बदरी ने चाँद हरा
मनवा में स्याह भरा
आँखें चकोर की
बरसाएँ  नीर
 

बंशी की टेर उठे नदिया के तीर

ररुही ने राग भरे
असगुन ने पाँव धरे
विरहन की आह उठे
जियरा को चीर 

बंशी की टेर उठे नदिया के तीर

4 टिप्‍पणियां:

  1. लोक-गीतों का माधुर्य समेटे सरस टेर समाई है इस गीत में !

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  2. किसी बड़े महाकाव्य या खण्ड काव्य का अंश लग रही है कविता !

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