रविवार, 24 जनवरी 2010

प्रीति के दोहे

प्रीति हिया ऐसी जगी, भागा भेद-विवेक
हर अमूर्त औ' मूर्त में,
रुप दृष्टिगत एक

रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण
पढूँ, गुनूँ आठो पहर, तुममें ही निर्वाण


नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार
डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार


सुबह, तुम्हारी ही हँसी, दुपहर, मधुरी बैन
साँझ तुम्हारी प्रीति है, आलिंगन है रैन

पुष्प, तुम्हारी स्निग्धता, आभा पाए भोर
वाणी ले सरगम बने, पाए प्रीत चकोर

6 टिप्‍पणियां:

  1. dohe achhe hain par ek baat kahun....vyakhya bhi kar dete to achha hota

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  2. रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण
    पढूँ, गुनूँ आठो पहर, तुममें ही निर्वाण ...

    बहुत सुंदर दोहे ....... एक से बढ़ कर एक ....... सजग, मान को शांति देते .......... और ये बहुत ही लाजवाब .........

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  3. सुबह, तुम्हारी ही हँसी, दुपहर, मधुरी बैन
    साँझ तुम्हारी प्रीति है, आलिंगन है रैन

    Behtareen ! Achha likha hai aapne !

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  4. बेहतरीन रचना
    नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार
    डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार
    बहुत बहुत बधाई

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  5. waaaaaaaaaaaaaaaaaah ...ab ja kar is blog jagat me ek poore kavi se mila hun .. :) waah

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  6. अच्छा है ! श्लोक भी ट्राई किजिये !

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