बुधवार, 28 अप्रैल 2010

एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गया

एक लमहा ज़िन्दगी की वो कहानी कह गया
दूर तक बस राह में आलम ख़ला का रह गया

जो चला था खूँ जिगर से उमड़ के तूफ़ान सा
आते आते आँख तक वो सिर्फ पानी रह गया

हो गयीं तनहा मेरी पलकें भी अब तो एकदम
हमनफ़स इक ख्वाब ही था, आज लेकिन वह गया
ढूँढती है राह सूनी, चाँद की परछाईयाँ
आज भी आया नहीं वो, किस हवा सँग बह गया

अबके सावन में पड़ेंगे आग के शोले बहुत
जाते जाते इक परिंदा गुलसितां से कह गया


ज़िन्दगी यूँ भी चली, यूँ भी चलेगी ज़िन्दगी
जो बढ़ा वो पार निकला, जो थमा वह रह गया

5 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. ढूँढती है राह सूनी, चाँद की परछाईयाँ
    आज भी आया नहीं वो, किस हवा सँग बह गया

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

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  3. ek ek sher gazab ka tha sir...aur sanjay ji lagta hai aapne tippaniyan kahin paste kar rakhi hain baar baar wahi copy paste karte hain kya...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  4. एक शब्द में कहूं तो "दर्द" !--
    "जो चला था खूँ जिगर से उमड़ के तूफ़ान सा
    आते आते आँख तक वो सिर्फ पानी रह गया"

    ऐसा कैसे लिखा जाता है , जरा समझाइयेगा कभी !

    मुग्ध कर देने वाली पंक्तियां !

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