शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

तुम प्रेम-दीप

तुम प्रेम-दीप,
तुम राग-ज्योति
अंतह में मेरे प्रस्थापित,
उर-आँगन
जीवन-उपवन
हर पल प्रदीप्त
हर पल आलोकित.

तुम प्रेम-अब्धि,
तुम राग-सरित
हो हृदय-धरा पर
कल-कल वाहित
आनंद, हर्ष की
विपुल राशि तुम
भरती मुझमे जीवन-अमृत

तुम प्रेम-मेघ,
तुम राग-सलिल
झरती मुझमें
रिमझिम- रिमझिम
कण कण मेरे
प्राण-गात का
सरस, सिक्त, अतिशय मधुरिम.

हृदय, प्राण,
मन पर आच्छादित,
रोम रोम पर तुम अंकित,
तुममे मैं हूँ,
तुम मुझमे हो,
गात विलग, हिय एक किन्तु.

सघन स्नेह
साधे सौरभ,
मन मुग्ध, मुदित, मधुमय, मुकुरित.
प्रेम-पयोधि
प्रखर प्रवेग
अहा अनुराग ! अंतह अभिजित.

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