रविवार, 4 दिसंबर 2011

कुछ सामयिक दोहे

देश बना बाज़ार अब, चारो ओर दुकान
राशन है मँहगा यहाँ, सस्ता है ईमान

राजा- रानी तो गए, गया न उनका मंत्र
मतपेटी तक ही सदा, रहा प्रजा का तंत्र

सर्वाहारी क्यों इसे, बना दिया भगवान ?
ज़र,जमीन,पशु-खाद्य तक, खा जाता इंसान

गंगाएँ कितनी बहीं, 'बुधिया' रहा अतृप्त
जब जब है सूखा पड़ा, नेता सारे तृप्त

बापू , तुम लटके रहो, दीवारों को थाम
नमन तुम्हें कर नित्य हम, करते 'अपना काम'

5 टिप्‍पणियां:

  1. कल 06/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. प्रिय बंधुवर प्रताप नारायण सिंह जी
    सस्नेहाभिवादन !

    शायद पहली बार पहुंचा हूं आपके यहां …
    बहुत परिपक्व दोहे लिखे हैं आपने …

    देश बना बाज़ार अब, बिकता हर सामान
    राशन है महंगा यहां , सस्ता है ईमान

    बहुत ख़ूब ! अच्छा लिखते हैं आप !
    …अर्थात् आप भी छंदबद्ध काव्य-सृजन करते हैं
    पुनः फ़ुरसत में आपकी पिछली पुरानी पोस्ट्स देखने आऊंगा … :)

    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. इतनी उच्च कोटि के दोहे कभी कभार ही पढ़ने को मिलते हैं। आनंद आया मित्र। मेरे ब्लॉग http://thalebaithe.blogspot.com/ पर भी पधारिएगा वहाँ छंदों पर काम चलता रहता है।

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  4. बहुत सुन्दर सधे हुये दोहे....
    सादर बधाई....

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